नयी दिल्ली, 17 सितंबर (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने बृहस्पतिवार को नागरिक समाज समूह ‘कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव’ को अपने कामकाज के खर्चों को वहन करने के लिए इसके ‘‘रिजर्व फंड’’ से 20 लाख रुपये निकालने की अनुमति देने वाले आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
इस समूह का विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम (एफसीआरए) पंजीकरण 2025 में रद्द कर दिया गया था।
मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने केंद्र सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें एकल न्यायाधीश पीठ के 19 मई के आदेश को चुनौती दी गई थी। अदालत ने कहा कि किसी संगठन का एफसीआरए लाइसेंस रद्द होने का मतलब यह नहीं है कि वह अपना कामकाज बंद कर देगा।
पीठ ने कहा कि एफसीआरए पंजीकरण रद्द होने का मतलब सिर्फ इतना है कि संगठन को विदेशी अंशदान नहीं मिल सकता। साथ ही, पीठ ने केंद्र से कहा कि वह इस आदेश को रद्द कराने के लिए एकल न्यायाधीश की पीठ का रुख करे।
केंद्र की अपील का निस्तारण करते हुए और उसे उपयुक्त अर्जी दायर करने की छूट देते हुए अदालत ने कहा, ‘‘यह आदेश 19 मई 2026 को ही पारित किया गया था। इस आदेश को रद्द करने का अनुरोध करें।’’
उच्च न्यायालय ने एकल न्यायाधीश पीठ से इस मामले में सुनवाई में तेजी लाने का अनुरोध किया।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने दलील दी कि एकल न्यायाधीश का आदेश एफसीआरए को गलत तरीके से समझने के कारण दिया गया था।
उन्होंने यह भी दलील दी कि अंतरिम आदेश अधिकारियों को ‘कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव’ की अंतरिम राहत की याचिका पर जवाब दाखिल करने का मौका दिए बिना ही जारी कर दिया गया था।
खंडपीठ ने कहा, ‘‘इस समय हमें दलीलों के गुण-दोष पर गौर करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि एकल न्यायाधीश का आदेश एक अंतरिम आदेश है और अपील करने वाला इसे रद्द करने की मांग कर सकता है।’’
एकल न्यायाधीश की पीठ ने 19 मई को ‘कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव’ को बैंक ऑफ इंडिया में रखे अपने ‘‘रिजर्व फंड’’ से 20 लाख रुपये निकालने की अनुमति दी थी।
भाषा सुभाष नरेश
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