मानहानि व राजनीतिक आलोचना के बीच महीन रेखा: सोशल मीडिया पोस्ट के खिलाफ राघव चड्ढा की याचिका पर अदालत

Ads

मानहानि व राजनीतिक आलोचना के बीच महीन रेखा: सोशल मीडिया पोस्ट के खिलाफ राघव चड्ढा की याचिका पर अदालत

  •  
  • Publish Date - May 21, 2026 / 04:17 PM IST,
    Updated On - May 21, 2026 / 04:17 PM IST

नयी दिल्ली, 21 मई (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि राजनीतिक आलोचना और मानहानि के बीच की रेखा बहुत महीन है। इसके साथ ही अदालत ने सांसद राघव चड्ढा से सवाल किया कि क्या वह सोशल मीडिया पर उनके ‘‘राजनीतिक निर्णय’’ की आलोचना करने वाली पोस्टों के प्रति ‘संवेदनशील’ हो सकते हैं।

चड्ढा हाल ही में आम आदमी पार्टी (आप) छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए हैं। उन्होंने कथित दुर्भावनापूर्ण और मनगढ़ंत सोशल मीडिया पोस्टों के खिलाफ उच्च न्यायालय में मुकदमा दायर किया है। उनका कहना है कि ये पोस्ट उनकी प्रतिष्ठा और व्यक्तित्व अधिकारों के लिए गंभीर रूप से हानिकारक हैं।

चड्ढा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव नायर ने दलील दी कि कुछ पोस्टों में आपत्तिजनक सामग्री का इस्तेमाल किया गया है, जिनमें से एक में उन्हें ‘‘पैसे के लिए खुद को बेच देने वाला’’ दिखाया गया है।

इस तरह की कथित आपत्तिजनक सामग्री को हटाने के लिए अंतरिम राहत के अनुरोध पर फैसला सुरक्षित रखते हुए न्यायमूर्ति सुब्रमणियम प्रसाद ने स्वीकार किया कि एक व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार है, वहीं संविधान के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार भी छीना नहीं जा सकता।

न्यायमूर्ति प्रसाद ने सुनवाई के दौरान कहा, ‘‘यह किसी व्यक्ति द्वारा राजनीतिक निर्णय की आलोचना है… एक राजनीतिक नेता के रूप में, क्या आप संवेदनशील हो सकते हैं?’’

अदालत ने कहा, ‘‘स्वतंत्रता के बाद से ही हम आर.के. लक्ष्मण के कार्टून देखते आ रहे हैं… राजनीतिक और आर्थिक रूप से लिए गए निर्णयों की विभिन्न तरीकों से आलोचना की गई है… अब सोशल मीडिया का प्रभाव और भी बढ़ गया है। लेकिन अंततः, यह किसी व्यक्ति की टिप्पणी के दायरे में ही आता है।’’

चड्ढा के वकील ने जोर दिया कि जिन पोस्टों में यह संकेत दिया गया है कि उन्होंने ‘‘पैसे के लिए कदम उठाया’’, उन्हें ‘उचित आलोचना’ नहीं कहा जा सकता।

उन्होंने दलील दी कि आपत्तिजनक पोस्ट ‘‘एक दिन भी नहीं रहनी चाहिए’’, लेकिन न्यायमूर्ति प्रसाद ने कहा कि प्रथम दृष्टया वे केवल आलोचना प्रतीत होती हैं।

न्यायाधीश ने मौखिक टिप्पणी में कहा, ‘‘मेरे अनुसार, प्रथम दृष्टया, ये सभी केवल एक राजनीतिक निर्णय की आलोचना हैं।’’

अदालत ने कहा, ‘‘मानहानि और आलोचना के बीच की रेखा बहुत महीन है, है ना? दूसरी ओर फिसलना बहुत आसान है, जिससे गरिमापूर्ण जीवन जीने के आपके अधिकार पर असर पड़ता है और आप एक ही साथ इस पक्ष का उल्लंघन नहीं कर सकते। आपका अनुच्छेद 19 (1) (ए) का अधिकार भी छीना नहीं जा सकता।”

यह देखते हुए कि कथित आपत्तिजनक पोस्ट अज्ञात व्यक्तियों द्वारा किए गए थे, न्यायाधीश ने मामले में अदालत की सहायता के लिए ‘‘एमिकस क्यूरी’’ (अदालत मित्र) नियुक्त करने का सुझाव दिया।

चड्ढा के वकील ने कहा कि वह इस स्तर पर मानहानि के आधार पर अपना दावा पेश कर रहे हैं, न कि व्यक्तित्व अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर।

चड्ढा की ओर से अधिवक्ता एस आनंद और निखिल आराधे भी पेश हुए। उन्होंने अपनी याचिका में सोशल मीडिया मंचों पर व्यापक रूप से प्रसारित झूठी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से निर्मित और ‘डीपफेक’ सामग्री को तत्काल हटाने की मांग की।

भाषा अविनाश मनीषा

मनीषा