गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर करना अपने शरीर पर हक का उल्लंघन है: दिल्ली उच्च न्यायालय

गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर करना अपने शरीर पर हक का उल्लंघन है: दिल्ली उच्च न्यायालय

गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर करना अपने शरीर पर हक का उल्लंघन है: दिल्ली उच्च न्यायालय
Modified Date: January 8, 2026 / 06:20 pm IST
Published Date: January 8, 2026 6:20 pm IST

(फाइल फोटो के साथ)

नयी दिल्ली, आठ जनवरी (भाषा) चौदह हफ्ते के गर्भ को गिराने पर पति द्वारा दर्ज कराये गये एक आपराधिक मामले में महिला को बरी करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि किसी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर करना उसके ‘अपने शरीर पर हक’ का उल्लंघन और मानसिक आघात बढ़ाने वाला कदम है।

महिला अपने पति से अलग रह रही है।

 ⁠

वैवाहिक कलह की स्थिति में गर्भपात कराने के महिला के स्वायत्त अधिकार पर जोर देते हुए, न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने कहा कि इस मामले यह नहीं कहा जा सकता कि याचिकाकर्ता पत्नी ने भादंसं की धारा 312 (गर्भपात कराना) के तहत अपराध किया है।

न्यायाधीश ने कहा कि चयन की स्वतंत्रता व्यक्तिगत स्वायत्तता का एक पहलू है और प्रजनन पर नियंत्रण सभी महिलाओं की एक बुनियादी आवश्यकता और अधिकार है।

उच्च न्यायालय ने कहा कि चिकित्सा गर्भपात अधिनियम के तहत गर्भवती महिला के लिए गर्भपात वास्ते पति की अनुमति लेना जरूरी नहीं है तथा इस कानून के मूल में महिला के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को होने वाली ‘गंभीर क्षति’ के प्रति सरोकार है।

उच्च न्यायालय ने छह जनवरी को अपने फैसले में कहा,‘‘यदि कोई महिला गर्भावस्था जारी नहीं रखना चाहती है, तो उसे ऐसा करने के लिए मजबूर करना अपने शरीर पर उसके अपने हक का उल्लंघन है और यह उसके मानसिक आघात को बढ़ाता है, जो उसके मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होगा।’’

याचिकाकर्ता महिला ने सत्र अदालत के उस आदेश उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी जिसमें उसे भादंसं की धारा 312 के तहत मजिस्ट्रेट अदालत के समक्ष पेशी के लिए तलब किये जाने पर मुहर लगायी गयी थी।

उसने तर्क दिया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन स्वायत्तता की उसे जो गारंटी दी गयी है उसे अपराधी की श्रेणी में डाल दिया गया है तथा निजता, शरीर पर खुद का अधिकार और निर्णय लेने की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के उसके वैध इस्तेमाल की अनदेखी की गई है।

पति ने तर्क दिया कि चूंकि गर्भपात की तारीख पर दंपति साथ रह रहे थे और इसलिए उनके बीच कोई वैवाहिक कलह नहीं थी, इसलिए एमटीपी अधिनियम के प्रावधान लागू नहीं होंगे।

हालांकि, उच्च न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि वैवाहिक कलह को इस तरह से परिभाषित नहीं किया जा सकता कि यह केवल पक्षों के अलग होने और मुकदमेबाजी में जाने के बाद ही मौजूद हो।

उसने कहा कि इस मामले में बहिरंग रोगी विभाग (ओपीडी) संबंधी कागजात में महिला ने जो कारण बताया है, वह दर्शाता है कि वह पहले से ही शादी के दबाव से गुजर रही थी और उसने पति से अलग होने का निर्णय ले लिया था।

भाषा राजकुमार पवनेश

पवनेश


लेखक के बारे में