गोरखालैंड मुद्दे से लेकर शासन तक: दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र का नए राजनीतिक दौर में प्रवेश

गोरखालैंड मुद्दे से लेकर शासन तक: दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र का नए राजनीतिक दौर में प्रवेश

गोरखालैंड मुद्दे से लेकर शासन तक: दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र का नए राजनीतिक दौर में प्रवेश
Modified Date: March 29, 2026 / 11:25 am IST
Published Date: March 29, 2026 11:25 am IST

(प्रदीप्त तापदार)

दार्जिलिंग, 29 मार्च (भाषा) दार्जिलिंग में सड़कों, पर्यटक स्थलों और कल्याणकारी योजनाओं के संकेत चिह्नों के साथ लगती दीवारों पर ‘हमें गोरखालैंड चाहिए’ के नारे की अब धुंधली तस्वीरें ही दिखाई देती है, जो इस बात का साफ संकेत है कि कैसे पर्वतीय क्षेत्र की राजनीति अलग राज्य के सपने से हटकर अब शासन में रोजमर्रा की मांगों पर केंद्रीत हो रही है।

उत्तर बंगाल के दार्जिलिंग, कालिम्पोंग और कुर्सियोंग में दशकों से राजनीति एक अलग गोरखालैंड राज्य की मांग के वादे के इर्द गिर्द घूमती है जो दशकों से क्षेत्र के लोगों से भावनात्मक रूप से जुड़ी है। यह आकांक्षा आज भी जीवित है लेकिन अब यह पर्वतीय क्षेत्र में राजनीति की एकमात्र भाषा नहीं रह गई है।

पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले पर्वतीय क्षेत्र में एक गहरा बदलाव देखने को मिल रहा है। राजनीतिक मान्यता की पुरानी मांग अब कुछ अन्य मजबूत मांगों के साथ जुड़ गई है जैसे कि सड़कों की मरम्मत कौन करेगा, पर्यटन को कौन पुनर्जीवित करेगा, पीने के पानी की व्यवस्था कौन करेगा, स्कूलों और अस्पतालों में सुधार कौन करेगा, चाय बागानों में मजदूरी कौन बढ़ाएगा और कल्याणकारी योजनाओं के लिए धन का प्रवाह कौन बनाए रखेगा?

नतीजतन पर्वतीय इलाकों में गोरखालैंड के सपने और उसे साकार करने की राजनीति के बीच टकराव के कारण वर्षों में सबसे जटिल चुनावी मुकाबला देखने को मिल रहा है।

एक स्तर पर यह चुनाव राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस – भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा (बीजीपीएम) गठबंधन और भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के बीच एक मुकाबला है।

तृणमूल समर्थित अनित थापा के नेतृत्व वाली बीजीपीएम मतदाताओं को यह समझाने की कोशिश कर रही है कि अंतहीन आंदोलनों का दौर समाप्त हो चुका है और अब पर्वतीय इलाकों को विकास की जरूरत है।

इसके उलट भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) एक बार फिर ‘‘स्थायी राजनीतिक समाधान’’ के भावनात्मक विचार में फिर जान डालने की कोशिश कर रही है और यह तर्क दे रही है कि सड़कें, कल्याण और पर्यटन परियोजनाएं गोरखा पहचान के अनसुलझे प्रश्न का विकल्प नहीं बन सकती हैं।

कुर्सियोंग के एक चाय बागान के कर्मचारी ने कहा, ‘‘पहले लोगों ने गोरखालैंड के सपने के लिए वोट दिया था। अब वे यह भी जानना चाहते हैं कि उनके गांव के लिए सड़क की मरम्मत कौन करेगा।’’

पश्चिम बंगाल में 1980 के दशक में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) के हिंसक आंदोलन से लेकर बिमल गुरुंग के गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) के उदय तक, पर्वतीय क्षेत्र की राजनीति लंबे समय से अलग राज्य के अधूरे वादे से प्रेरित रही है।

भाजपा का 2009 के बाद इस परिदृश्य में पदार्पण हुआ। एक के बाद एक चुनाव में उसने जीजेएम और बाद में जीएनएलएफ के समर्थन से दार्जिलिंग लोकसभा सीट बरकरार रखी, साथ ही ‘‘स्थायी राजनीतिक समाधान’’ का वादा भी किया।

हालांकि बार-बार किए गए वादों के पूरा नहीं होने से लोगों में निराशा पैदा हुई है, और इन वादों के प्रति उनका आकर्षण भी कम हुआ है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसाआईआर) ने इस निराशा को और बढ़ा दिया है।

हालांकि, इन सबके बीच तृणमूल कांग्रेस ने खुद को इस रणनीति में बड़ी चतुराई से ढाल लिया है। पहले के चुनाव में जहां तृणमूल कांग्रेस को मुख्य रूप से एक ‘‘मैदानी’’ पार्टी के रूप में देखा जाता था और गोरखा मतदाताओं के बीच उसकी पकड़ बहुत कम थी, लेकिन इसके विपरीत अब वह बीजीपीएम के साथ अपने गठबंधन और अपनी कल्याणकारी योजनाओं की बढ़ती पहुंच का लाभ उठाने की कोशिश कर रही है।

भाजपा का मानना ​​है कि तृणमूल-बीजीपीएम गठबंधन गोरखालैंड की भावना की गहराई को कम आंक रहा है। यही कारण है कि पार्टी ने एक बार फिर पुराने सहयोगियों, पुराने प्रतीकों और पुराने वादों का सहारा लिया है।

बिमल गुरुंग के नेतृत्व वाले जीजेएम गुट ने दार्जिलिंग जिले की सभी सात विधानसभा सीट पर भाजपा उम्मीदवारों को बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा की और कहा कि केवल भाजपा ही स्थायी राजनीतिक समाधान दे सकती है।

भाजपा का संदेश भी उतना ही सरल है: पहचान के बिना विकास अधूरा है।

दशकों में पहली बार होगा जब पर्वतीय क्षेत्र के लोग केवल गोरखालैंड के सपने पर ही नहीं बल्कि इस बात पर भी मतदान करने जा रहे हैं कि कौन प्रशासन की जिम्मेदारी निभा सकता है – यह एक सपने की राजनीति और उसे साकार करने की राजनीति के बीच का मुकाबला है।

भाषा सुरभि अमित

अमित


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