घुसपैठ से लेकर प्रेरक कहानियों तक: एलओसी स्थित ऐतिहासिक युद्ध स्थल पर संग्रहालय और जांच चौकी खुली

घुसपैठ से लेकर प्रेरक कहानियों तक: एलओसी स्थित ऐतिहासिक युद्ध स्थल पर संग्रहालय और जांच चौकी खुली

घुसपैठ से लेकर प्रेरक कहानियों तक: एलओसी स्थित ऐतिहासिक युद्ध स्थल पर संग्रहालय और जांच चौकी खुली
Modified Date: May 14, 2026 / 09:49 pm IST
Published Date: May 14, 2026 9:49 pm IST

(तस्वीरों के साथ)

(सुमीर कौल)

साधना पास (जम्मू-कश्मीर), 14 मई (भाषा) बर्फ से ढकी चोटियों से घिरा यह दुर्गम इलाका कभी पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) से घुसपैठ के लिए जाना जाता था। इस दर्रे का नाम दिवंगत अभिनेत्री साधना के नाम पर रखा गया है। बृहस्पतिवार को, इस दर्रे का कुख्यात और प्रसिद्ध अतीत, वर्तमान से जुड़ गया, जब इस ऊंचे स्थान पर एक जांच चौकी और एक युद्ध संग्रहालय का उद्घाटन किया गया।

जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने संग्रहालय और जांच चौकी का उद्घाटन करते हुए कहा, ‘‘यह पूरे देश की ओर से एक संदेश है कि हम अपने वीर सैनिकों को हमेशा याद रखते हैं और हमेशा याद रखेंगे… पहाड़ हमारे सैनिकों की एकता के साक्षी हैं।’’

शमशाबाड़ी पर्वत शृंखला में 10,269 फुट की ऊंचाई पर स्थित, अत्याधुनिक एकीकृत पारगमन प्रतिष्ठान और शौर्य गाथा परिसर ‘सैंड मॉडल हिल’ चोटी पर मौजूद है। यह कर्णाह और कुपवाड़ा के बीच स्थित है, जो कश्मीर घाटी को जोड़ने वाले ऊंचे, वन दर्रों से होकर गुजरने वाले मार्ग पर पड़ता है।

एकीकृत पारगमन प्रतिष्ठान मादक पदार्थों के व्यापार को रोकने के लिए एक जांच चौकी है, वहीं सेना की 28वीं इन्फैंट्री डिवीजन और 104वीं ब्रिगेड द्वारा निर्मित युद्ध संग्रहालय वीरता और साहस की गाथाओं की याद दिलाता है। साधना दर्रे (जिसे पहले नास्ताचुन दर्रे के नाम से जाना जाता था) पर स्थित ये दोनों प्रतिष्ठान दो साल से भी कम समय में बनकर तैयार हो गए।

अक्टूबर 1965 में जब फिल्म ‘मेरे महबूब’ की अभिनेत्री ने पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय सेना की जीत पर बधाई देने के लिए यहाँ का दौरा किया, तब इस दर्रे का नाम बदल दिया गया। उस समय जिन चोटियों पर भारत ने कब्जा कर लिया था, उन्हें ताशकंद समझौते के बाद पाकिस्तान को वापस सौंप दिया गया।

बृहस्पतिवार को माहौल उत्सवपूर्ण था। सिन्हा का स्वागत करने के लिए आसपास के इलाकों से लोग कार्यक्रम स्थल पर एकत्र हुए थे।

यह आयोजन रक्षा मंत्रालय के जनवरी 2025 के उस निर्णय के बाद हुआ जिसमें इस क्षेत्र को भारत के प्रमुख युद्धक्षेत्र पर्यटन स्थलों में से एक के रूप में बढ़ावा देने की बात कही गई थी।

सैनिकों, पूर्व सैनिकों और स्थानीय लोगों की सभा को संबोधित करते हुए उपराज्यपाल सिन्हा ने परिसर को बलिदान का जीवंत प्रतीक बताया।

उन्होंने कहा कि आम नागरिकों और सीमाओं की रक्षा करने वाले सैनिकों के बीच की ‘‘भावनात्मक दूरी’’ को पाटना होगा।

सिन्हा ने कहा, ‘‘चाहे वह तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश या केरल का कोई युवक हो, जब वह इस धरती पर खड़ा होगा, तो उसे वीरता की ऐसी भावना मिलेगी जो कोई किताब नहीं सिखा सकती।’’

उन्होंने लोगों को इस स्थान को अपने अवकाश स्थल के रूप में चुनने के लिए प्रोत्साहित किया और कहा कि इस तरह की ‘‘पवित्र भूमि’’ की यात्रा बलिदानियों को श्रद्धांजलि देने के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करेगी।

उपराज्यपाल ने सीमा पार से होने वाली मादक पदार्थों की तस्करी के मुद्दे पर भी बात की और सीमाओं की रक्षा करने तथा ‘नशा मुक्ति’ अभियान का नेतृत्व करने में सेना की दोहरी भूमिका की सराहना की।

सिन्हा ने चेतावनी देते हुए कहा, ‘‘यह वह जगह है जहां से हमारा दुश्मन ‘नशा’ कारोबार को बढ़ावा देने की कोशिश करता है।’’

उन्होंने तस्करी पर अंकुश लगाने के लिए एक रणनीतिक कदम के रूप में हवाई अड्डे जैसी अवसंरचना सहित नए ढांचे के निर्माण के लिए सेना को धन्यवाद दिया।

जांच चौकी में सभी की तलाशी ली जाएगी, और वहां प्रशिक्षित कुत्ते भी मौजूद रहेंगे।

दूसरी ओर, शौर्य गाथा संग्रहालय से क्षेत्रीय पर्यटन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। इस संग्रहालय में स्वतंत्रता के बाद से तंगधार क्षेत्र में लड़े गए युद्धों को अमर बनाने वाले अवशेषों, अभिलेखों और कथाओं का संग्रह है। यह स्थान भारत-पाकिस्तान के तीन युद्धों का क्षेत्र रहा है।

पर्यटक हरबख्श स्थल भी जा सकते हैं, जिसका नाम तत्कालीन ब्रिगेडियर हरबख्श सिंह के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने 1947-48 के युद्ध के दौरान तंगधार और तीतवाल पर कब्जा करने के अभियान का नेतृत्व किया था।

इस कार्यक्रम में लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा, जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ (जीओसी-इन-सी), उत्तरी कमान, लेफ्टिनेंट जनरल बलबीर सिंह, जीओसी 15वीं कोर और ब्रिगेडियर धर्मेंद्र यादव सहित वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

भाषा नेत्रपाल नरेश

नरेश


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