भू-राजनीतिक तनाव, नयी तकनीकों से देशों के बीच संपर्क करने का तरीका बदल रहा: न्यायमूर्ति नाथ

भू-राजनीतिक तनाव, नयी तकनीकों से देशों के बीच संपर्क करने का तरीका बदल रहा: न्यायमूर्ति नाथ

भू-राजनीतिक तनाव, नयी तकनीकों से देशों के बीच संपर्क करने का तरीका बदल रहा: न्यायमूर्ति नाथ
Modified Date: August 23, 2026 / 09:46 pm IST
Published Date: August 23, 2026 9:46 pm IST

नयी दिल्ली, 23 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश विक्रम नाथ ने रविवार को कहा कि भू-राजनीतिक तनाव, आर्थिक अनिश्चितता और नयी तकनीकों के कारण देशों के एक-दूसरे के साथ संपर्क करने का तरीका बदल रहा है।

यहां 11वें ‘ब्रिक्सप्लस लीगल फोरम’ में उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश ने दुनिया के सामने आ रही नयी चुनौतियों की ओर इशारा किया और कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) अब कोई दूर की तकनीकी संभावना नहीं रह गई है, बल्कि यह पहले से ही आर्थिक और सामाजिक जीवन का हिस्सा बन रही है और इसका इस्तेमाल आगे और बढ़ेगा।

न्यायमूर्ति नाथ ने कहा, ‘‘भू-राजनीतिक तनाव, आर्थिक अनिश्चितता और नयी तकनीकों के कारण देशों के एक-दूसरे के साथ संबंध रखने और संपर्क करने का तरीका बदल रहा है। साथ ही, इस बात पर भी चर्चा बढ़ रही है कि जो संस्थाएं दशकों से अंतरराष्ट्रीय संबंधों का मार्गदर्शन करती आई हैं, क्या वे आज की दुनिया की वास्तविक स्थिति को पर्याप्त रूप से दर्शाती हैं।’’

उन्होंने कहा कि यदि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बदल रही है, तो एक और बुनियादी सवाल भी पूछा जाना चाहिए—मतभेदों के बावजूद देशों को आपस में मिलकर काम करते रहने में क्या सक्षम बनाएगा।

उन्होंने कहा, ‘‘मेरा मानना है कि इसका उत्तर कुछ हद तक कानून के शासन में निहित है। यह सहयोग को एक निश्चितता प्रदान करता है और एक ऐसा साझा ढांचा उपलब्ध कराता है, जिसके भीतर मतभेदों का समाधान किया जा सकता है। यह हमें बताता है कि प्रतिबद्धताएं महत्वपूर्ण होती हैं, संस्थाओं को जवाबदेह होना चाहिए और मतभेदों को सुलझाने के लिए निष्पक्ष और विश्वसनीय साधन होने चाहिए।’’

‘बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में ब्रिक्स देशों के प्रतिनिधि और भारत के वकील शामिल हुए।

न्यायमूर्ति नाथ ने कहा, ‘‘एआई अब कोई दूर की तकनीकी संभावना नहीं रह गई है। यह पहले से ही आर्थिक और सामाजिक जीवन का हिस्सा बनती जा रही है और इसका उपयोग आने वाले समय में और बढ़ेगा। एआई को लेकर ब्रिक्स में हुई चर्चाओं में ऐसे शासन-तंत्र की आवश्यकता को स्वीकार किया गया है, जो नवाचार को बढ़ावा दे और साथ ही सुरक्षा, समावेशिता, मानवाधिकार तथा समान एवं न्यायसंगत पहुंच से जुड़े मुद्दों का भी समाधान करे।’’

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कानूनी पेशे के लिए दिलचस्प सवाल केवल यह नहीं है कि एआई को कैसे नियंत्रित किया जाना चाहिए, बल्कि यह है कि कानून ऐसी तकनीकों के प्रति कैसे प्रतिक्रिया दे, जो पारंपरिक नियामक प्रक्रियाओं की तुलना में कहीं अधिक तेजी से विकसित हो रही है।

न्यायमूर्ति नाथ ने कहा, ‘‘तकनीक को अक्सर गति को अधिकतम करने के लिए तैयार किया जाता है, जबकि कानून का उद्देश्य अलग होता है। कानून में जांच-पड़ताल, तर्क और जवाबदेही के लिए जगह होनी चाहिए। तकनीक चाहे कितनी भी तेजी से आगे बढ़ रही हो, हमें यह समझना होगा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानव निर्णय से स्वतंत्र नहीं है।’’

उन्होंने कहा कि भारत का अपना अनुभव विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों, परंपराओं और विचारों की विविधता के साथ रहने का रहा है, लेकिन इसके बावजूद यह मानने की जरूरत नहीं पड़ी कि लोगों को किसी साझा आधार पर सहमत होने से रोका जाए।

उन्होंने कहा, ‘‘शायद यही एक कारण है कि भारत के दृष्टिकोण से ब्रिक्स का विचार जाना-पहचाना लगता है। यहां प्रतिनिधित्व करने वाले देश अपनी राजनीतिक व्यवस्थाओं, आर्थिक संरचनाओं या कानूनी परंपराओं में एक जैसे नहीं हैं। उन्हें एक साथ लाने वाली चीज समानता नहीं, बल्कि यह स्वीकार करना है कि ऐसे क्षेत्र हैं, जहां सहयोग करना न केवल संभव है, बल्कि आवश्यक भी है…’’।

भाषा देवेंद्र नरेश

नरेश


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