ग्रेट निकोबार परियोजना स्थानीय आदवासियों के परामर्श से लागू हो : वनवासी कल्याण आश्रम
ग्रेट निकोबार परियोजना स्थानीय आदवासियों के परामर्श से लागू हो : वनवासी कल्याण आश्रम
(आदित्य देव)
नयी दिल्ली, 22 मई (भाषा) अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के अध्यक्ष सत्येंद्र सिंह ने कहा है कि ग्रेट निकोबार परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है और इसे स्थानीय आदिवासी समुदायों के परामर्श से लागू किया जाना चाहिए ताकि क्षेत्र की पारिस्थितिकी के साथ-साथ उनके हितों की भी रक्षा की जा सके।
सिंह ने ‘पीटीआई-वीडियो’ को दिये विशेष साक्षात्कार में कहा, ‘‘दोनों उद्देश्य महत्वपूर्ण हैं। इन आदिवासी समुदायों का संरक्षण और सुरक्षा होनी चाहिए और सीमावर्ती क्षेत्र भी सुरक्षित रहना चाहिए। अतः सरकार को स्थानीय समुदायों से परामर्श करके परियोजना को आगे बढ़ाना चाहिए और विकास योजना को सावधानीपूर्वक और जिम्मेदारी से लागू करना चाहिए।’’
उन्होंने कहा, ‘‘इसलिए, यदि सरकार इस परियोजना को शुरू कर रही है, तो उसे वास्तव में पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी कल्याण सुनिश्चित करना चाहिए।’’
पर्यावरणविदों, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कई अन्य विपक्षी नेताओं ने परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर चिंता जताई है। इस बारे में पूछे जाने पर सिंह ने कहा कि वे ‘‘पूरी तरह से गलत नहीं हैं’’।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) से संबद्ध अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के अध्यक्ष ने कहा, ‘‘पर्यावरणीय जोखिम होने की बात सही है’’। उन्होंने साथ ही रेखांकित किया कि यह क्षेत्र भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है।
सिंह ने शोम्पेन, जरावा और सेंटिनलीज जैसे संवेदनशील आदिवासी समूहों का भी जिक्र किया और कहा कि वे मुख्यधारा के समाज के साथ सीमित संपर्क पसंद करते हैं तथा उन्हें संरक्षित रखा जाना चाहिए।
सिंह ने कहा, ‘‘ये अत्यंत संवेदनशील समुदाय मुख्यधारा के आधुनिक समाज के साथ व्यापक संपर्क नहीं चाहते हैं, लेकिन वे भी भारत का हिस्सा हैं और उन्हें संरक्षित रखा जाना चाहिए।’’
वनवासी कल्याण आश्रम अध्यक्ष ने आदिवासी समुदायों के विस्थापन को लेकर जताई गई चिंताओं को स्वीकार किया। उन्होंने माना कि आदिवासियों की पैतृक भूमि अनिवार्य रूप से प्रभावित होगी और कहा कि उचित मुआवजा और पुनर्वास उपाय आवश्यक होंगे।
उन्होंने कहा, ‘‘स्वाभाविक रूप से, भूमि प्रभावित होगी। कुछ विस्थापन अपरिहार्य है। संतुलन बनाए रखना होगा। वहां के आदिवासी समुदायों के पास पुश्तैनी जमीन है, इसलिए उन्हें किसी न किसी रूप में मुआवजा दिया जाना चाहिए। वही भूमि शायद दोबारा न मिल पाए, लेकिन उन्हें समान स्तर का समर्थन और अवसर दिए जाने चाहिए ताकि वे जीवन में आगे बढ़ सकें।’’
सिंह ने मीडिया में आई खबरों का हवाला देते हुए कहा कि केंद्र सरकार इस क्षेत्र में एक बंदरगाह, एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और टाउनशिप के बुनियादी ढांचे को विकसित करने की योजना बना रही है, जिसकी अनुमानित लागत 72,000 करोड़ रुपये से 92,000 करोड़ रुपये के बीच है और इसे 2047 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
उन्होंने कहा, ‘‘उस क्षेत्र में समुद्री मार्ग रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि देश को सुरक्षित रहना है, तो सीमावर्ती क्षेत्रों और समुद्री क्षेत्रों को भी ठीक से सुरक्षित करना आवश्यक है।’’
सिंह ने कहा, ‘‘ मौजूदा समय में भारत उस क्षेत्र में समुद्री और लॉजिस्टिक जरूरतों के लिए श्रीलंका और सिंगापुर जैसे देशों पर काफी हद तक निर्भर है। इसलिए, सरकार ने वहां एक बहुत बड़ा बंदरगाह, अंतरराष्ट्रीय स्तर का हवाई अड्डा और संभवतः एक टाउनशिप और संबंधित बुनियादी ढांचा विकसित करने की योजना बनाई है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि पर्यावरण संरक्षण उपायों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।’’
उन्होंने कहा, ‘‘साथ ही, सरकार ने पर्यावरण संरक्षण उपायों को लागू करने की बात भी कही है। खबरों के मुताबिक, योजनाओं में कई गलियारे बनाना शामिल है ताकि वन्यजीवों को खतरा न हो और पेड़-पौधे सुरक्षित रहें। पारिस्थितिक नुकसान को कम करने वाली बुनियादी संरचना बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन ऐसी बातें कहना आसान है, उन्हें लागू करना कहीं ज्यादा मुश्किल है।’’
राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में कैम्पबेल बे स्थित ग्रेट निकोबार परियोजना ‘‘देश की प्राकृतिक और आदिवासी विरासत के खिलाफ सबसे बड़े घोटालों और सबसे गंभीर अपराधों में से एक है’’।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने दावा किया है कि इस परियोजना में 160 वर्ग किलोमीटर में फैले वर्षावन में लाखों पेड़ों की कटाई शामिल होगी। उन्होंने इसे ‘विकास के आवरण में छिपा विनाश’ बताते हुए कहा कि वह इस मुद्दे को संसद में उठाएंगे।
भाषा धीरज पवनेश
पवनेश

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