गुजरात: मंदिर ट्रस्ट की जमीन के मामले में बड़ौदा के शाही परिवार की 35 साल पुरानी याचिका खारिज
गुजरात: मंदिर ट्रस्ट की जमीन के मामले में बड़ौदा के शाही परिवार की 35 साल पुरानी याचिका खारिज
अहमदाबाद, 18 जून (भाषा) गुजरात उच्च न्यायालय ने पूर्ववर्ती बड़ौदा रियासत के शाही परिवार की 35 साल पुरानी याचिका खारिज कर दी है। इस याचिका में अधीनस्थ अदालत के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसमें एक मंदिर ट्रस्ट की 707 एकड़ जमीन पर उनके दावे को खारिज कर दिया गया था।
बुधवार को पारित और बृहस्पतिवार को जारी आदेश में, अदालत ने कहा कि इस तरह की जिद और लंबे समय तक चलने वाले मुकदमों से न्यायिक संसाधनों पर बोझ पड़ता है और अदालत का कीमती समय बर्बाद होता है।
आदेश में न्यायमूर्ति जेसी दोशी ने अपीलकर्ता (बड़ौदा के महाराजा) की कड़ी आलोचना की। अदालत ने कहा कि यह प्रथम अपील ‘याचिकाकर्ता’ की उस अनैतिक और स्वार्थपूर्ण मंशा का स्पष्ट उदाहरण है, जिसके तहत वह मामले को अंतहीन मुकदमेबाजी में उलझाए रखना चाहता है ताकि न्यायालयी कार्यवाही को लगातार जारी रखकर देवता (मंदिर) की संपत्ति पर अनिश्चितता और विवाद का साया हमेशा बनाए रखा जा सके।
अपीलों की पहली खेप उच्च न्यायालय में 1991 में दायर की गई थीं। ये अपीलें अधीनस्थ अदालत द्वारा बड़ौदा के पूर्व शासक के उस दावे को खारिज करने के बाद दायर की गई थीं जिसमें उन्होंने जमीन के एक टुकड़े पर अपना हक जताया था।
परमार्थ आयुक्त ने इस जमीन को वडोदरा के जिला कलेक्टर द्वारा प्रबंधित यवतेश्वर महादेव मंदिर ट्रस्ट की संपत्ति घोषित किया था।
मामले के विवरण के अनुसार, उक्त ट्रस्ट 1952 में गुजरात पब्लिक ट्रस्ट एक्ट, 1950 के प्रावधानों के तहत पंजीकृत किया गया था।
इसके कामकाज का प्रबंधन सरकार द्वारा कलेक्टर के माध्यम से किया जाता था, जो पदेन ट्रस्टी और प्रशासक होते थे।
हालांकि, 1956 में बड़ौदा के महाराजा फतेहसिंहराव गायकवाड़ का नाम पूरी ज़मीन के कब्जेदार के तौर पर दर्ज कर दिया गया।
जब वडोदरा के कलेक्टर को इस बारे में पता चला, तो उन्होंने इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण के लिए पत्र लिखे और फिर जांच के लिए परमार्थ आयुक्त से संपर्क किया।
पूर्ववर्ती बड़ौदा रियासत के तत्कालीन महाराजा ने इस आवेदन पर आपत्ति जताई। उन्होंने दावा किया कि विवादित जमीन उनकी निजी संपत्ति है और यह विशाल लक्ष्मी विलास पैलेस का ही एक हिस्सा है। महाराजा ने कहा कि भारत संघ के साथ हस्ताक्षरित विलय समझौते के अनुसार, यह पैलेस उनकी संपत्ति है।
जब सहायक परमार्थ आयुक्त ने यह तय किया कि विवादित ज़मीन मंदिर ट्रस्ट की है, तो महाराजा ने संयुक्त परमार्थ कल्याण आयुक्त के सामने इसे चुनौती दी, जिन्होंने उनकी याचिका और दो अन्य अपीलों को खारिज कर दिया।
इसके बाद पूर्व महाराजा जिला अदालत गए लेकिन उसने भी अपीलों को खारिज कर दिया। इसके बाद अपील करने वालों ने 1991 में उच्च न्यायालय का रुख किया।
अपीलों को खारिज करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि इस तरह की जिद और लंबे समय तक चलने वाले मुकदमों से न्यायिक संसाधनों पर बोझ पड़ता है और अदालत का कीमती समय बर्बाद होता है।
भाषा संतोष माधव
माधव

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