गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ जीएचसीएए अध्यक्ष की याचिका पर फैसला सुरक्षित

गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ जीएचसीएए अध्यक्ष की याचिका पर फैसला सुरक्षित

गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ जीएचसीएए अध्यक्ष की याचिका पर फैसला सुरक्षित
Modified Date: April 7, 2026 / 09:27 pm IST
Published Date: April 7, 2026 9:27 pm IST

नयी दिल्ली, सात अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (जीएचसीएए) अध्यक्ष यतीन ओझा की उस याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया, जिसमें उन्होंने राज्य की न्यायपालिका के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने के लिए उच्च न्यायालय द्वारा उन्हें दोषी ठहराने और सजा सुनाने के फैसले को चुनौती दी है।

उच्च न्यायालय ने ओझा को दिन की सुनवाई समाप्त होने तक की सजा सुनायी थी। उच्च न्यायालय ने ओझा पर 2,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया था और कहा था कि जुर्माना नहीं भरने की स्थिति में उन्हें दो महीने की साधारण कारावास भुगतनी होगी। हालांकि सजा पर अमल को 60 दिनों तक लंबित कर दिया गया था।

ओझा 20 दिसंबर, 2025 को 19वीं बार जीएचसीए अध्यक्ष चुने गए थे।

न्यायमूर्ति जे. के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने ओझा की ओर से के.के. वेणुगोपाल, कपिल सिब्बल, अभिषेक सिंघवी और अरविंद दातार सहित कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया।

गुजरात उच्च न्यायालय की ओर से वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया पेश हुए, जिन्होंने कहा कि यह मुद्दा न्यायपालिका की गरिमा से संबंधित है।

सिब्बल ने पीठ से मामले के निपटारे का आग्रह करते हुए कहा कि ओझा अपने बयान के लिए कई बार बिना शर्त माफी मांग चुके हैं।

सिब्बल ने कहा, “मैं (ओझा) ढाई साल से अपने (वरिष्ठ) गाउन के बिना हूं। माननीय न्यायाधीशों ने वीडियो देखा है, उसमें कुछ भी नहीं है। उन्हें पहले ही सज़ा मिल चुकी है। माननीय न्यायाधीशों को यह तय करना है कि अब बस बहुत हो गया। उन्होंने पहले ही खेद व्यक्त कर दिया है..।”

सिंघवी ने कहा, “आज, सजा पूरी हो चुकी है, उन्हें कुछ समय के लिए एक सामान्य वकील की तरह जीवन जीने का अधिकार है। आपके पास उन्हें सज़ा देने का अधिकार है। ऐसा नहीं है कि वे मूर्ख हैं कि सबक नहीं सीखेंगे। अब इसके निपटारे का समय आ गया है…।”

फिलहाल, उच्चतम न्यायालय ओझा की उस अपील पर सुनवाई कर रहा है जो उच्च न्यायालय के छह अक्टूबर, 2020 के फैसले के खिलाफ है। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में ओझा को दोषी ठहराया था और अदालत की दिन की सुनवाई समाप्त होने तक की सजा सुनाई थी।

उच्च न्यायालय ने ओझा पर 2,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया था और स्पष्ट किया था कि जुर्माना नहीं भरने की स्थिति में उन्हें दो महीने की साधारण कारावास भुगतनी होगी। हालांकि, सजा का क्रियान्वयन 60 दिनों के लिए निलंबित कर दिया गया था।

बाद में उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय द्वारा दी गई सजाओं का निलंबन जारी रखा।

भाषा अमित सुरेश

सुरेश


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