उच्च न्यायालय ने सूरत में 100 परिवारों को बेघर करने संबंधी अवैध कार्रवाई पर जवाब मांगा

उच्च न्यायालय ने सूरत में 100 परिवारों को बेघर करने संबंधी अवैध कार्रवाई पर जवाब मांगा

उच्च न्यायालय ने सूरत में 100 परिवारों को बेघर करने संबंधी अवैध कार्रवाई पर जवाब मांगा
Modified Date: July 2, 2026 / 09:34 pm IST
Published Date: July 2, 2026 9:34 pm IST

अहमदाबाद, दो जुलाई (भाषा) गुजरात उच्च न्यायालय ने बृहस्पतिवार को राज्य सरकार से सूरत के नारिसनगर इलाके में 30 मई को की गई ‘पूरी तरह से गैर-कानूनी’ तोड़फोड़ की कार्रवाई पर उसका जवाब मांगा।

इस कार्रवाई में बिना किसी पूर्व सूचना के लगभग 100 घर गिरा दिए गए थे।

उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार से पूछा कि क्या वह अपने नागरिकों के प्रति ज़िम्मेदार नहीं है। उच्च न्यायालय ने कहा कि निगमायुक्त से कहीं ज़्यादा वरिष्ठ अधिकारी के स्तर पर जांच होनी चाहिए थी।

सूरत नगर निगम द्वारा घर गिराए जाने से प्रभावित कुछ लोगों की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति निखिल करियल ने सरकार से पूछा कि इस ‘पूरी तरह से गैर-कानूनी’ तोड़फोड़ पर उसका क्या रुख है।

न्यायमूर्ति करियल ने पुलिस आयुक्त से यह मौखिक सवाल भी पूछा कि घटनास्थल पर डीसीपी स्तर के अधिकारी की मौजूदगी के बावजूद इस मामले में कोई शिकायत क्यों नहीं की गई और न ही कोई जांच हुई।

सूरत के निगमायुक्त ने अदालत में दिए अपने हलफनामे में बताया कि निगम के उप निगमायुक्त की शुरुआती जांच में यह राय बनी कि मामले की और जांच की जरूरत है, क्योंकि संबंधित अधिकारी सच नहीं बता रहे थे। हलफनामे में यह भी कहा गया कि तोड़फोड़ की कार्रवाई के दौरान मौके पर मौजूद पांच अधिकारियों को विभागीय कार्यवाही पूरी होने तक निलंबित कर दिया गया है।

उच्च न्यायालय ने सरकारी वकील से मौखिक रूप से पूछा, ‘‘इस पर राज्य सरकार का क्या रुख है? यह जांच निगम और उसके अधिकारियों की एक टीम द्वारा की गयी। राज्य का क्या रुख है? क्या राज्य अपने नागरिकों के प्रति ज़िम्मेदार नहीं है?’’

उच्च न्यायालय ने कहा कि यह बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ का मामला है और अगर याचिका दायर नहीं की गई होती, तो जांच रिपोर्ट भी शायद इतनी जल्दी सामने नहीं आ पाती।

न्यायमूर्ति करियल ने कहा, ‘‘छोटी-मोटी झड़पों पर तो राज्य सरकार को चिंता होती है, लेकिन जब इतने बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ हो रही है, तो उसे कोई चिंता नहीं है… राज्य सरकार को निश्चित रूप से यह पता लगाने में दिलचस्पी लेनी चाहिए कि ऐसा कैसे हुआ।’’

अदालत ने कहा, ‘‘यह कोई एक बार की घटना नहीं हो सकती। अगर आपके अधिकारी में ऐसा कुछ करने की हिम्मत है — 100 घर, भगवान जाने अब तक आपने ऐसा और क्या-क्या किया होगा जो अभी तक सामने नहीं आया है।’’

अदालत ने यह भी पूछा कि क्या किसी व्यक्ति का घर गिराया जाना दंडनीय अपराध नहीं है। अदालत ने पुलिस आयुक्त से सवाल किया कि जब उन्हें इस घटनाक्रम के बारे में लिखित रूप में सूचित किया गया था, तब भी कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई।

अदालत ने यह भी जानना चाहा कि निगमायुक्त उन लोगों के पुनर्वास की क्या योजना बना रहे हैं जो ‘अनधिकृत तोड़फोड़’ के कारण बेघर हो गए थे।

भाषा राजकुमार सुरेश

सुरेश


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