केदारनाथ सिंह पंचतत्व में विलीन, हिंदी कविता का एक कोना सूना
केदारनाथ सिंह पंचतत्व में विलीन, हिंदी कविता का एक कोना सूना
और एक सुबह मैं उठूंगा
मैं उठूंगा पृथ्वी-समेत
जल और कच्छप-समेत मैं उठूंगा
मैं उठूंगा और चल दूंगा उससे मिलने
जिससे वादा है
कि मिलूंगा।
और सच में केदारनाथ सिंह अपना वादा निभाने चले गए। मंगलवार को दिल्ली के लोधी रोड स्थित श्मशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया, जिसके साथ ही वो हमेशा-हमेशा के लिए सिर्फ स्मृतियों में शेष रह गए हैं, लेकिन उनकी रचनाएं हमेशा रहेंगी क्योंकि वो कालजयी हैं, अमर हैं। हिंदी कविता के आधुनिक कवियों में सिरमौर माने जाने वाले डॉ. केदारनाथ सिंह के निधन से हिंदी कविता का एक कोना सूना पड़ गया है। उनकी कमी हर किसी को खल रही है क्योंकि उनकी कविताएं बिल्कुल प्रासंगिक, सहज होती थीं, जो आंखों के रास्ते सीधे दिल में उतर जाती थीं।
कवि केदारनाथ सिंह को प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ सम्मान, साहित्य अकादमी पुरस्कार, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, व्यास सम्मान, दिनकर पुरस्कार, जीवन भारती पुरस्कार, कुमारन आशान पुरस्कार के साथ-साथ इतने सम्मानों से सम्मानित किया गया था कि उनके निधन की दुखद खबर दुनिया के सामने लाने के लिए ज्यादातर पत्रकारों को गूगल सर्च इंजन तक का सहारा लेना पड़ गया। दूसरी ओर इतने सम्मानों से नवाजे गए डॉ. केदारनाथ सिंह से मिलने वालों को कभी ये आभास तक नहीं हो पाया कि वो हिंदी साहित्य की इतनी महान हस्ती से रू-ब-रू हो रहे हैं। ये खासियत थी केदारनाथ सिंह की।

उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के चकिया गांव में 1 जुलाई 1934 को उनका जन्म हुआ था। 1956 में उन्होंने बनारस से हिंदी में एमए किया था और फिर बाद में वहीं से पीएचडी भी की। हिंदी शिक्षण का कार्य उन्होंने पहले गोरखपुर में किया, बाद में वो दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिंदी भाषा विभाग के अध्यक्ष बने और इसी पद से रिटायर हुए। डॉ. केदारनाथ सिंह सिर्फ पद से रिटायर हुए थे, उनकी लेखनी उनके आजीवन कभी रिटायर नहीं हुई। वो कवि भी थे, आलोचक भी और संपादक भी।
दिल्ली में रहने के बावजूद उनका मन गांव में बसता था और हिंदी के प्रखर कवि होने के बावजूद मन भोजपुरी के लिए ललचाता था। उनकी कई रचनाओं में उनका पूर्वांचली प्रेम साफ झलकता है। हिंदी और भोजपुरी दोनों को लेकर उनकी सोच उनके ही शब्दों में देखिए –
हिंदी मेरा देश है, भोजपुरी मेरा घर,
घर से निकलता हूं तो चला जाता हूं देश में,
देश से छुट्टी मिलती है तो चला आता हूं घर,
इस आवाजाही में कई बार घर में चला आता है देश,
देश में कई बार छूट जाता है घर
मैं दोनों को प्यार करता हूं,
और देखिए न मेरी मुश्किल,
पिछले साठ बरसों से,
दोनों में दोनों को खोज रहा हूं।
गांव और शहर पर केंद्रित उनकी कविताएं अमिट छाप छोड़ती हैं। अभी बिल्कुल अभी, जमीन पक रही है, यहां से देखो, बाघ, अकाल में सारस, उत्तर कबीर और अन्य कविताएं, तालस्ताय और साइकिल उनके प्रमुख कविता संग्रहों में एक हैं। केदारनाथ सिंह की साहित्यिक यात्रा पर के बिक्रम सिंह ने एक फिल्म भी बनाई थी। उनका जीवन सफर 19 मार्च को थम गया, जब दिल्ली के एम्स में उन्होंने 83 साल की उम्र में आखिरी सांसें ली। जैसे ही ये खबर सामने आई, साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई क्योंकि उनके जैसे सहज भाषा शैली में कविताएं लिखने वाले कवि विरले ही होते हैं, हिंदी का एक कोना को हमेशा के लिए सूना कर गया उनका जाना और शायद वो इस बात को पहले से भांपते थे क्योंकि उन्होंने ही लिखा था कि जाना हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है।
परमेंद्र मोहन, वेब डेस्क, IBC24

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