पति बेरोजगारी का बहाना बनाकर बच्चे के प्रति अपने कर्तव्य से नहीं बच सकता: अदालत
पति बेरोजगारी का बहाना बनाकर बच्चे के प्रति अपने कर्तव्य से नहीं बच सकता: अदालत
नयी दिल्ली, छह जून (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने घरेलू हिंसा के एक मामले में एक व्यक्ति को अपने बेटे को 6,000 रुपये मासिक भरण-पोषण देने का निर्देश देते हुए कहा है कि कोई पति बेरोजगार होने का दावा करके अपनी पत्नी और छोटे बच्चे के प्रति अपनी कानूनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शीतल चौधरी प्रधान एक महिला द्वारा दायर अपील पर सुनवाई कर रही थीं, जिसने निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण (पीडब्ल्यूडीवी) अधिनियम के तहत उसे आर्थिक राहत देने से इनकार कर दिया गया था। न्यायाधीश ने महिला की अपील स्वीकार कर ली।
अदालत ने दो जून के अपने आदेश में कहा, ‘‘अपने खर्चों का प्रबंधन करना प्रतिवादी/पति का दायित्व है और केवल बेरोजगार होने या अन्य जिम्मेदारियों का बहाना बना कर वह अपनी कानूनी रूप से विवाहित पत्नी और नाबालिग बेटे के भरण-पोषण से मुक्त नहीं हो सकता।’’
इसने कहा कि पति भरण-पोषण का भुगतान करने में सक्षम है और उसे बच्चे के बालिग होने तक उसके भरण-पोषण के लिए प्रति माह 6,000 रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया।
महिला ने आरोप लगाया था कि फरवरी 2013 में उसकी शादी हुई थी और उसके बाद उसके पति और उसके परिवार के सदस्यों ने दहेज के लिए उसका उत्पीड़न किया। महिला ने दावा किया कि गर्भावस्था के दौरान उसे ससुराल से निकाल दिया गया था और वह 2015 से अपने बेटे के साथ अलग रह रही है।
अदालती अभिलेखों के अनुसार, वर्ष 2015 में पारिवार अदालत के समक्ष हुए एक समझौते के बाद दंपति कुछ समय के लिए फिर से साथ रहने लगा था। वे कुछ महीनों तक किराए के मकान में रहे, लेकिन बाद में दोबारा अलग हो गए।
सितंबर 2025 में निचली अदालत ने घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत महिला की शिकायत को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि वह घरेलू हिंसा और आर्थिक शोषण के आरोपों को साबित करने में असफल रही।
हालांकि, अपीलीय अदालत ने यह माना कि शारीरिक हमले और क्रूरता के आरोप चिकित्सा दस्तावेजों (मेडिकल रिकॉर्ड) या किसी स्वतंत्र साक्ष्य से सिद्ध नहीं हो पाए, लेकिन उसने यह पाया कि पति वर्ष 2015 से बच्चे के भरण-पोषण के लिए कोई आर्थिक सहायता नहीं दे रहा था।
अदालत ने कहा, ‘‘नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी प्रतिवादी (पति) की भी समान रूप से है।’’
इसने यह भी उल्लेख किया कि बच्चा कई वर्षों से मां की अभिरक्षा में था और इस दौरान पिता की ओर से कोई आर्थिक सहायता प्रदान नहीं की गई।
अदालत ने कहा, ‘‘मेरे सुविचारित मत में, प्रतिवादी/पति अपने नाबालिग पुत्र के वयस्क (18 वर्ष की आयु) होने तक, इस आदेश की तिथि से प्रति माह 6,000 रुपये भरण-पोषण राशि देने में सक्षम है।’’
भाषा शोभना नेत्रपाल
नेत्रपाल

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