आईबीसी से बैंकिंग क्षेत्र की स्थिति को सुधारने में मदद मिली: सीतारमण
आईबीसी से बैंकिंग क्षेत्र की स्थिति को सुधारने में मदद मिली: सीतारमण
नयी दिल्ली, एक अप्रैल (भाषा) वित्त एवं कॉरपोरेट मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण ने बुधवार को राज्यसभा में कहा कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के कारण देश की बैंकिंग प्रणाली में काफी सुधार हुआ है तथा वाणिज्यिक बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) की वसूली में भी मदद मिली है।
राज्यसभा में विधेयक पर हुई संक्षिप्त चर्चा का उत्तर देते हुए सीतारमण ने कहा कि इसके लागू होने के कुछ ही वर्षों के भीतर इसे विश्व स्तर पर मान्यता मिल चुकी है।
यह अधिनियम 2016 में लागू हुआ था और तब से इसमें सात संशोधन हो चुके हैं।
उनके जवाब के बाद राज्यसभा ने इस विधेयक को ध्वनि मत से मंजूरी प्रदान कर दी। इसके साथ ही, इस विधेयक को संसद की मंजूरी मिल गयी। लोकसभा इसे पहले ही मंजूरी दे चुकी है।
विधेयक में लाए गए संशोधनों के संबंध में सीतारमण ने कहा कि आईबीसी एक ऐसा कानून है जो आर्थिक गतिविधियों से संबंधित है और इस कानून को अर्थव्यवस्था की बढ़ती जरूरतों के अनुरूप ढालना होगा। सरकार उद्योग और हितधारकों की मांग के अनुसार समय-समय पर कानून में संशोधन करती रही है।
मंत्री ने कहा, ‘‘भारत के लिए मैं ठोस बात कह सकती हूं कि इस संहिता ने वास्तव में हमारे बैंकिंग क्षेत्र की स्थिति सुधारने में योगदान दिया है। भारत के बैंकिंग क्षेत्र के बेहतर होने का एक कारण यह भी है कि आईबीसी के माध्यम से परिसंपत्तियों की वसूली की गई है और प्रक्रिया पूरी करके बैंकों को उनका पैसा वापस दिया गया है।’’
उन्होंने कहा कि बैंकों ने विभिन्न माध्यमों से कुल 1,04,099 करोड़ रुपये की वसूली की है, और इस कुल राशि में से अकेले आईबीसी के माध्यम से 54,528 करोड़ रुपये की महत्वपूर्ण राशि प्राप्त हुई है, जो कुल वसूली का 52.3 प्रतिशत है।
वित्त मंत्री ने कहा कि आईबीसी का मकसद कंपनियों का परिसमापन करना नहीं, बल्कि ऐसा समाधान प्रदान करना है जिससे वे चलती रहें।
उन्होंने कहा कि इस कानून को कंपनियों के समक्ष तनाव को दूर करने और ऐसा समाधान प्रदान करने के लिए लाया गया था जिससे वे किसी हद तक फिर से पटरी पर आ सकें और फिर कुछ सुरक्षा उपायों के साथ उस स्थिति को प्राप्त कर सकें जिसमें वे पहले चल रही थीं।
उन्होंने कहा कि अंततः कुछ कंपनियां ऐसी होती हैं जिनका बार-बार प्रयास करने के बावजूद कोई समाधान संभव नहीं होता, इसलिए वे परिसमापन का सहारा लेती हैं।
भाषा अविनाश सुभाष
सुभाष

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