भारत ने पश्चिम एशिया संकट और एकतरफा प्रतिबंधों पर गंभीर चिंता जताई

भारत ने पश्चिम एशिया संकट और एकतरफा प्रतिबंधों पर गंभीर चिंता जताई

भारत ने पश्चिम एशिया संकट और एकतरफा प्रतिबंधों पर गंभीर चिंता जताई
Modified Date: May 14, 2026 / 10:02 pm IST
Published Date: May 14, 2026 10:02 pm IST

(तस्वीरों के साथ)

नयी दिल्ली, 14 मई (भाषा) भारत ने बृहस्पतिवार को पश्चिम एशिया के संकट और होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल आपूर्ति तथा समुद्री स्थिरता पर इसके प्रभाव के संबंध में गंभीर चिंता जताते हुए ब्रिक्स देशों से भू-राजनीतिक उथल-पुथल से बेहतर ढंग से निपटने के लिए ‘‘व्यावहारिक तरीके’’ खोजने का आग्रह किया।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने यह टिप्पणी यहां आयोजित ब्रिक्स के दो दिवसीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में की। जयशंकर ने किसी देश विशेष का नाम लिए बिना कहा कि अंतरराष्ट्रीय संबंध संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर आधारित होने चाहिए और किसी संघर्ष के समाधान के लिए ‘संवाद और कूटनीति’ ही सतत मार्ग प्रदान करते हैं।

जयशंकर ने कहा कि भारत तनाव कम करने की कोशिशों में अच्छा योगदान देने और स्थिरता बहाल करने की कोशिशों को समर्थन देने के लिए तैयार है। साथ ही, उन्होंने कहा कि ‘‘शांति टुकड़ों में नहीं हो सकती’’ और ‘‘अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करना, आम लोगों की रक्षा करना और सार्वजनिक ढांचे को निशाना बनाने से बचना ज़रूरी है।’’

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि नए सदस्य देशों के लिए विभिन्न महत्वपूर्ण मुद्दों पर ब्रिक्स की सहमति आधारित व्यवस्था को पूरी तरह समझना और अपनाना जरूरी है। उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब पश्चिम एशिया संघर्ष को लेकर संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और ईरान के बीच तीखे मतभेद सामने आए हैं।

यह पता चला है कि सम्मेलन के दो सत्र में से एक के दौरान ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के विदेश राज्य मंत्री खलीफा शाहीन अल मरार के बीच तीखी बहस हुई। शांति कायम करने के लिए रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव को हस्तक्षेप करना पड़ा।

हाल के हफ्तों में यूएई में ऊर्जा अवसंरचना पर ईरान के हमलों को लेकर ईरान और यूएई के बीच तीखी बयानबाजी हुई है, जिसके परिणामस्वरूप ब्रिक्स पश्चिम एशिया संकट पर एक सर्वसम्मत बयान जारी करने में विफल रहा है।

ब्रिक्स में शुरुआत में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल थे। 2024 में इसका विस्तार कर इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात को शामिल किया गया। वर्ष 2025 में इंडोनेशिया भी इस समूह का सदस्य बना।

जयशंकर ने कहा, “ब्रिक्स की सुचारु प्रगति के लिए यह आवश्यक है कि बाद में जुड़े सदस्य विभिन्न महत्वपूर्ण मुद्दों पर ब्रिक्स की सहमति को पूरी तरह समझें और उसका समर्थन करें।”

विदेश मंत्री ने होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर से सुरक्षित और निर्बाध समुद्री आवाजाही सुनिश्चित करने की भी ज़ोरदार वकालत की और गाजा में लड़ाई के ‘गंभीर मानवीय असर’ पर चिंता जताई।

भारत की मेजबानी में हुई यह बैठक इसलिए और भी जरूरी हो गई है क्योंकि यह प्रभावशाली समूह पश्चिम एशिया संकट के आर्थिक नतीजों, खासकर ऊर्जा आपूर्ति में भारी रुकावटों और व्यापार तथा शुल्क पर अमेरिका की नीति से जूझ रहा है।

अराघची और लावरोव के अलावा, ब्राजील के विदेश मंत्री माउरो विएरा, इंडोनेशिया के विदेश मंत्री सुगिओनो और दक्षिण अफ्रीका के अंतरराष्ट्रीय संबंध मंत्री रोनाल्ड लामोला भी बैठक में उपस्थित वरिष्ठ नेताओं में शामिल थे।

जयशंकर ने कहा, ‘‘पश्चिम एशिया में संघर्ष पर खास ध्यान देने की ज़रूरत है। लगातार तनाव, समुद्री यातायात के लिए जोखिम और ऊर्जा ढांचे में रुकावटें स्थिति की नाजुकता को दिखाती हैं।’’

विदेश मंत्री ने कहा कि होर्मुज और लाल सागर समेत अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों से सुरक्षित और निर्बाध समुद्री आवागमन वैश्विक आर्थिक भलाई के लिए अहम हो गया है।

उन्होंने कहा, ‘‘पूरे क्षेत्र में भी गंभीर चिंताएं हैं। गाजा संघर्ष के मानवीय परिणाम गंभीर हैं।’’

जयशंकर ने कहा, ‘‘स्थायी युद्धविराम, मानवीय सहायता की निर्बाध पहुंच और दीर्घकालिक एवं शांतिपूर्ण समाधान की विश्वसनीय दिशा अब भी बेहद आवश्यक है। जहां तक फलस्तीन मुद्दे का सवाल है, भारत दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करता है।’’

जयशंकर ने लेबनान और सीरिया के सामने मौजूद चुनौतियों के साथ-साथ सूडान, यमन और लीबिया में मौजूदा स्थिति का भी उल्लेख किया और इनसे निपटने के लिए निरंतर अंतरराष्ट्रीय भागीदारी और समन्वित राजनयिक प्रयासों का आह्वान किया।

जयशंकर ने कहा, ‘‘भारत तनाव कम करने के प्रयासों में रचनात्मक योगदान देने और स्थिरता बहाल करने के उद्देश्य से की गई पहल का समर्थन करने के लिए तैयार है।’’

उन्होंने किसी देश का नाम लिए बिना यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के विपरीत “एकतरफा दंडात्मक उपायों और प्रतिबंधों के बढ़ते उपयोग” को संबोधित करने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा, ‘‘इस तरह के कदमों का विकासशील देशों पर असमान रूप से प्रभाव पड़ता है। ये अनुचित उपाय संवाद का विकल्प नहीं हो सकते, न ही दबाव कूटनीति का स्थान ले सकता है।’’

विदेश मंत्री ने कहा कि दुनिया “अभूतपूर्व भू-राजनीतिक और आर्थिक अनिश्चितता” के दौर से गुजर रही है, जिससे विकास की संभावनाएं प्रभावित हो रही हैं और वैश्विक स्तर पर अस्थिरता बढ़ रही है।

उन्होंने कहा, “इनमें से कई मुद्दों के प्रभाव उनके मूल क्षेत्र से कहीं आगे तक जाते हैं। इनका असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों पर विशेष रूप से गंभीर होता है, क्योंकि इससे ऊर्जा, खाद्य और उर्वरक सुरक्षा पर दबाव बढ़ता है, आपूर्ति शृंखला बाधित होती है, महंगाई बढ़ती है और विकास की रफ्तार थम जाती है।’’

उन्होंने कहा कि इस संदर्भ में ब्रिक्स एकजुटता का विशेष महत्व है।

जयशंकर ने आतंकवाद को “लगातार बना रहने वाला खतरा” बताया और कहा कि आतंकवाद के किसी भी रूप को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

उन्होंने कहा, “सीमा पार आतंकवाद अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन करता है। कतई बर्दाश्त नहीं करने की नीति एक अटल और सार्वभौमिक मानदंड बनी रहनी चाहिए।’’

जयशंकर ने कहा कि तकनीकी प्रगति वैश्विक परिदृश्य को नया आकार दे रही है और डिजिटल विभाजन को पाटने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा, ‘‘जलवायु परिवर्तन एक निर्णायक चुनौती बनी हुई है। जलवायु संबंधी कार्रवाई को जलवायु न्याय के साथ-साथ विश्वसनीय प्रतिबद्धताओं, पर्याप्त वित्तपोषण और सुलभ समर्थन के साथ आगे बढ़ना होगा।’’

जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की भी वकालत की।

विदेश मंत्री ने कहा, ‘‘चुनौतियों के बढ़ने के बावजूद, दुर्भाग्यवश बहुपक्षीय प्रणाली कमजोर होती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। दिन-प्रतिदिन बहुपक्षवाद में सुधार की आवश्यकता और भी प्रबल होती जा रही है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘इसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों में सुधार शामिल है। निरंतर देरी से भारी नुकसान होगा।’’

उन्होंने कहा, ‘‘हमारे समय का संदेश स्पष्ट है: सहयोग आवश्यक है, संवाद अनिवार्य है और सुधार में देरी हो रही है। हमें एक अधिक स्थिर, न्यायसंगत और समावेशी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को आकार देने के लिए मिलकर काम करना होगा।’’

जयशंकर ने कहा कि भारत इन उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए सभी साझेदारों के साथ रचनात्मक रूप से जुड़ने के लिए प्रतिबद्ध है।

ब्रिक्स के विदेश मंत्रियों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी संयुक्त रूप से मुलाकात की।

समूह की अध्यक्षता कर रहे भारत ने सितंबर में होने वाले ब्रिक्स वार्षिक शिखर सम्मेलन से पहले विदेश मंत्रियों के सम्मेलन की मेजबानी की।

सम्मेलन में अपने संबोधन में अराघची ने कहा कि ईरान ‘‘अवैध विस्तारवाद और युद्धोन्माद’’ का शिकार है और उन्होंने ब्रिक्स देशों से अमेरिका और इजराइल द्वारा किए गए अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन की ‘‘स्पष्ट रूप से निंदा’’ करने का आग्रह किया।

उन्होंने कहा, ‘‘सच्चाई यह है कि ईरान, कई अन्य स्वतंत्र देशों की तरह, अवैध विस्तारवाद और युद्धोन्माद का शिकार है। ये घिनौनी बातें हैं जिनका आज की दुनिया में कोई स्थान नहीं है।’’

ईरान के विदेश मंत्री ने ब्रिक्स देशों से ‘‘पश्चिमी वर्चस्व और उस मनमानी की भावना का विरोध करने’’ का आह्वान किया, जिसके बारे में ‘‘अमेरिका का मानना ​​है कि वह उसका हकदार है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘इसलिए, ईरान ब्रिक्स सदस्य देशों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सभी जिम्मेदार सदस्यों से अमेरिका और इजराइल द्वारा अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन की स्पष्ट रूप से निंदा करने का आह्वान करता है।’’

ब्रिक्स दुनिया की 11 प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह है जो वैश्विक आबादी का लगभग 49.5 प्रतिशत, वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का करीब 40 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार का लगभग 26 प्रतिशत प्रतिनिधित्व करता है।

भाषा आशीष माधव

माधव


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