भारत पेट एवं आतं की बीमारियों के बीच फैटी लिवर, कोलोरेक्टल कैंसर के बढ़ते मामलों से जूझ रहा:विशेषज्ञ
भारत पेट एवं आतं की बीमारियों के बीच फैटी लिवर, कोलोरेक्टल कैंसर के बढ़ते मामलों से जूझ रहा:विशेषज्ञ
नयी दिल्ली, एक सितंबर (भाषा) चिकित्सा विशेषज्ञों ने मंगलवार को कहा कि भारत ‘हेलिकोबैक्टर पाइलोरी’ और आंतों के कीड़ों के संक्रमण जैसी लगातार बनी रहने वाली बीमारियों के साथ-साथ ‘फैटी लिवर’ और ‘कोलोरेक्टल कैंसर’ जैसी चयापचयी समस्याओं के रूप में बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है।
उन्होंने पेट एवं आंत संबंधी बीमारियों का जल्द पता लगाने और उनकी रोकथाम पर ज़्यादा ध्यान देने की जरूरत पर जोर दिया।
ये चिंताएं ‘वर्ल्ड कांग्रेस ऑफ़ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी (डब्ल्यूसीओजी) 2026′ से पहले सामने आई हैं। यह कार्यक्रम पहली बार भारत में 30 सितंबर से तीन अक्टूबर तक यहां द्वारका के यशोभूमि में आयोजित किया जाएगा, जिसमें दुनिया भर के पेट/आंत संबंधी विशेषज्ञ पाचन तंत्र से जुड़ी बीमारियों के बदलते स्वरूप और उनके बढ़ते स्वास्थ्य प्रभाव पर चर्चा करेंगे।
दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के विशेषज्ञों का कहना है कि साफ-सफाई, टीकाकरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों में सुधार से कई संक्रामक और रोकी जा सकने वाली बीमारियों को कम करने में मदद मिली है, लेकिन अब देश में चयापचयी और जीवनशैली से जुड़ी आंत संबंधी (पाचन तंत्र से जुड़ी) बीमारियों का बोझ बढ़ रहा है।
एम्स में ‘गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी’ (पाचन तंत्र संबंधी विज्ञान) और ‘ह्यूमन न्यूट्रिशन’ विभाग के प्रोफेसर और प्रमुख डॉ. प्रमोद गर्ग ने कहा, ‘‘भारत इस समय महामारी विज्ञान से जुड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। हमने जागरूकता, टीकाकरण और जीवन की गुणवत्ता में सुधार कर उन बीमारियों को रोकने में काफ़ी तरक्की की है जिनसे बचा जा सकता है, लेकिन अब हम चयापचयी बीमारियों को इतने बड़े पैमाने पर देख रहे हैं जिनका सामना हमने पहले कभी नहीं किया।’’
एम्स के ‘गैस्ट्रोएंटरोलॉजी’ विभाग के प्रोफेसर डॉ. शालीमार ने कहा कि ‘फैटी लिवर’ की बीमारी बड़ी चिंता बनकर उभरी है।
उन्होंने कहा कि एम्स के नेतृत्व में की गई एक व्यवस्थित समीक्षा और विश्लेषण में पाया गया कि भारत में 38.6 प्रतिशत वयस्कों और 35.4 प्रतिशत बच्चों में यह बीमारी है।
उन्होंने कहा कि यह बीमारी मधुमेह, मोटापे और उच्च रक्तचाप से गहराई से जुड़ी है। उन्होंने कहा कि कई बार इसके कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते और जब तक पता चलता है, तब तक यकृत को काफी नुकसान हो चुका होता है।
हाल के एक अध्ययन में यह भी पाया गया है कि ‘टाइप टू’ मधुमेह वाले हर चार मरीजों में से एक मरीज़ में ‘लिवर फ़ाइब्रोसिस’ की गंभीर समस्या देखी गई है।
भारत ने 2021 में गैर-संक्रामक रोगों की रोकथाम और नियंत्रण के राष्ट्रीय कार्यक्रम में ‘फैटी लिवर’ की बीमारी को शामिल किया और इसके बाद प्राथमिक देखभाल स्तर पर इसकी पहचान के लिए दिशानिर्देश भी भी जारी किये हैं।
डॉ. गर्ग ने कहा, ‘‘अगर हम चाहें तो इस बीमारी का पता आसानी से लगाया जा सकता है, लेकिन हमें इसके बारे में तब पता चलता है जब मरीज बीमार पड़ जाता है। यह पहले से कहीं बड़ी चुनौती है—हमें सिर्फ बीमारियों के इलाज तक सीमित नहीं रहना चाहिए; अब हमें अच्छी सेहत को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय रूप से काम करना होगा।’’
‘कोलोरेक्टल कैंसर’ एक और बढ़ती हुई चिंता का विषय है। डॉक्टर कम उम्र के लोगों में इसके मामले बढ़ने की बात कह रहे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2022 में भारत में पुरुषों में 40,430 और महिलाओं में 24,433 नए मामले सामने आए।
विशेषज्ञों का कहना है कि मल में खून आना, मल त्यागने की आदतों में लगातार बदलाव और बिना किसी स्पष्ट कारण के वज़न कम होने जैसी समस्याओं को सामान्य ‘गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल’ (पेट और आंतों से जुड़ी) समस्या समझकर नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।
एम्स के प्रोफ़ेसर और डब्ल्यूसीओजी 2026 की स्थानीय आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. गोविंद मखारिया ने कहा,‘‘भारत में कभी भी गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट (पेट या आंत संबंधी चिकित्सा विशेषज्ञों) या प्रौद्योगिकी की कमी नहीं रही है। कमी रही है तो बस शुरुआती लक्षणों को गंभीरता से लेने की आदत की।’’
उन्होंने कहा, ‘‘अगर कोई लक्षण दो-तीन हफ़्ते से ज़्यादा समय तक बना रहता है, तो उसकी जांच करवानी चाहिए।’’
लगातार होने वाले संक्रमण भी भारत में पेट और आंतों की बीमारियों के बोझ का एक अहम हिस्सा हैं। ‘एच पाइलोरी’ पेप्टिक अल्सर और पेट के कैंसर से जुड़ा है। यह अब भी बड़े पैमाने पर फैला हुआ है। आंतों में कीड़ों का संक्रमण बच्चों को प्रभावित करता रहता है और इससे रक्ताल्पता एवं कुपोषण की समस्या हो सकती है।
साथ ही ‘सीलिएक’ रोग और ‘इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज’ जैसी बीमारियां, जिन्हें कभी भारत में दुर्लभ माना जाता था, अब तेज़ी से नजर आ रही हैं।
एम्स के प्रोफ़ेसर और ‘क्रॉन्स कोलाइटिस फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया’ के महासचिव डॉ. विनीत आहूजा ने कहा, ‘‘जब मैंने प्रशिक्षण लिया था, तब भारत में ‘इंफ्लेमेटरी बॉवेल डिज़ीज़’ और ‘सीलिएक डिज़ीज़’ बहुत कम देखने को मिलती थीं, लेकिन अब हम हर हफ़्ते इनके मरीज़ नजर आते हैं।’’
डब्ल्यूसीओजी 2026 में ‘गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल’ बीमारियों के बदलते वैश्विक बोझ की समीक्षा करने के साथ-साथ डायग्नोस्टिक्स, एंडोस्कोपी, इलाज के तरीकों, गट माइक्रोबायोम रिसर्च और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-आधारित हेल्थकेयर में हुई तरक्की पर भी ध्यान दिया जाएगा।
भाषा राजकुमार पवनेश
पवनेश

Facebook


