भारत वैश्विक संकटों को अवसरों में बदले, आपूर्ति शृंखला को मजबूत करे: नड्डा

भारत वैश्विक संकटों को अवसरों में बदले, आपूर्ति शृंखला को मजबूत करे: नड्डा

भारत वैश्विक संकटों को अवसरों में बदले, आपूर्ति शृंखला को मजबूत करे: नड्डा
Modified Date: May 2, 2026 / 05:41 pm IST
Published Date: May 2, 2026 5:41 pm IST

सूरत, दो मई (भाषा) केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा ने शनिवार को कहा कि भारत को अपनी घरेलू ताकत बढ़ाने के लिए मौजूदा वैश्विक अनिश्चितताओं को अवसरों में बदलना चाहिए।

नड्डा ने 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए विनिर्माण क्षमता, लचीलेपन और आत्मनिर्भरता बढ़ाने का आह्वान किया।

दक्षिण गुजरात के दो-दिवसीय ‘वाइब्रेंट गुजरात क्षेत्रीय सम्मेलन’ के समापन समारोह को संबोधित करते हुए नड्डा ने कहा कि हालिया वैश्विक घटनाक्रम रणनीतिक निर्भरता कम करने और आपूर्ति शृंखला को मजबूत करने की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘हालिया वैश्विक अनिश्चितता इस बात का संकेत है कि हमें संकटों को अवसरों में बदलना चाहिए। हमें क्षेत्रीय सम्मेलनों के माध्यम से अपने विनिर्माण क्षेत्रों पर अधिकतम ध्यान देना होगा।’

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि आर्थिक शक्ति केवल विकास के बारे में ही नहीं है, बल्कि यह लचीलेपन, आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वायत्तता के बारे में भी है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत को वैश्विक अनिश्चितता को घरेलू ताकत में बदलना चाहिए और ‘‘देश के भीतर अधिक निर्माण और नवाचार करना चाहिए, ताकि महत्वपूर्ण कमजोरियों को कम किया जा सके’’।

नड्डा ने उल्लेख किया कि 2047 तक विकसित भारत की राह के लिए ‘निरंतर उच्च विकास दर, गहरी औद्योगिक क्षमता, निर्यात का विस्तार और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के साथ मजबूत एकीकरण’ आवश्यक है।

उन्होंने आपूर्ति शृंखला में व्यवधान, प्रौद्योगिकी नियंत्रण और संसाधन अवरोधों जैसे मुद्दों को हल करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

केंद्रीय मंत्री ने शासन के बारे में बात करते हुए उद्योगों के प्रति वर्तमान सरकार के दृष्टिकोण की तुलना 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में ‘वाइब्रेंट गुजरात’ पहल शुरू होने से पहले की मानसिकता से की।

उन्होंने याद दिलाते हुए कहा कि 21वीं सदी की शुरुआत में उद्योगपतियों, राजनेताओं और नौकरशाहों के बीच तालमेल का अभाव था। उस समय लोग उद्योगपतियों को संदेह की दृष्टि से देखते थे और उनके मन में यह सवाल रहता था कि उनका छिपा हुआ उद्देश्य क्या है और वे सरकार से क्या लाभ लेना चाहते हैं।

उन्होंने दावा किया कि उस समय राजनेता और नौकरशाह अक्सर व्यवसायों के लिए बाधाएं पैदा करने के बारे में सोचते थे।

नड्डा ने कहा कि 2003 में पहले वाइब्रेंट गुजरात शिखर सम्मेलन ने इस विचारधारा में आमूल-चूल परिवर्तन किया।

उन्होंने कहा, ‘वहां से एक नयी विचार प्रक्रिया विकसित हुई, जिसमें संवाद, चर्चा, निवेश, सहमति पत्रों, बाधाओं को दूर करने और मिलकर काम करने पर ध्यान केंद्रित किया गया।’

भाषा सुमित सुरेश

सुरेश


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