अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग की रिपोर्ट निंदनीय: 275 पूर्व न्यायाधीशों और अधिकारियों ने कहा

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अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग की रिपोर्ट निंदनीय: 275 पूर्व न्यायाधीशों और अधिकारियों ने कहा

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  • Publish Date - March 21, 2026 / 07:00 PM IST,
    Updated On - March 21, 2026 / 07:00 PM IST

नयी दिल्ली, 21 मार्च (भाषा) अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (यूएससीआईआरएफ) की हालिया रिपोर्ट की भारत के 275 पूर्व न्यायाधीशों, नौकरशाहों और सशस्त्र बलों के पूर्व अधिकारियों ने आलोचना की है। इस रिपोर्ट में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की गई है।

उन्होंने इसे निहित स्वार्थ से प्रेरित करार दिया और कहा कि इससे ‘‘बौद्धिक दिवालियापन एवं विकृत निष्कर्ष’’ प्रदर्शित होता है।

शनिवार को जारी एक संयुक्त बयान में, उन्होंने अमेरिका सरकार से यूएससीआईआरएफ की इस ‘‘अत्यधिक पक्षपातपूर्ण और निराधार रिपोर्ट’’ में योगदान देने वाले सभी लोगों की पृष्ठभूमि की जांच करने का आग्रह किया। उन्होंने आरोप लगाया कि इसमें निहित स्वार्थ शामिल हैं जिनका उद्देश्य भारत की साख को धूमिल करना है।

संयुक्त बयान में हस्ताक्षरकर्ताओं ने कहा, ‘‘यूएससीआईआरएफ द्वारा भारतीय नागरिकों की संपत्ति जब्त करने, आवाजाही प्रतिबंधित करने और आरएसएस से जुड़े लोगों पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश निहित स्वार्थ से प्रेरित है, और बौद्धिक दिवालियापन एवं विकृत निष्कर्षों को दर्शाती है।’’

इसमें कहा गया, ‘‘यूएससीआईआरएफ के सभी छह आयुक्तों की नियुक्ति अमेरिका सरकार द्वारा की जाती है और उन्हें अमेरिकी करदाताओं द्वारा अमेरिकी कांग्रेस के माध्यम से वित्त पोषित किया जाता है। हम अमेरिका सरकार से इस रिपोर्ट में योगदान देने वाले यूएससीआईआरएफ के सभी लोगों की पृष्ठभूमि की जांच करने का आह्वान करते हैं।’’

पूर्व न्यायाधीशों, नौकरशाहों और सशस्त्र बलों के पूर्व अधिकारियों ने कहा, ‘‘यह अमेरिका के करदाताओं के लिए आंखें खोलने वाला होगा, जिनके धन का उपयोग यूएससीआईआरएफ द्वारा कुछ भारत विरोधी निहित स्वार्थों के गुप्त एजेंडे को बढ़ावा देने और भारत की जनता के साथ उनकी सद्भावना को धूमिल करने के लिए अत्यधिक पक्षपातपूर्ण एवं निराधार रिपोर्ट तैयार करने के लिए किया जा रहा है।’’

इस बयान में यूएससीआईआरएफ की प्रवृत्ति पर चिंता जताई गई, जिसके तहत वह भारतीय संस्थानों और आरएसएस जैसे सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों को पर्याप्त संदर्भ के बिना नकारात्मक रूप से चित्रित करता है।

बयान में कहा गया, ‘‘यह यूएससीआईआरएफ की उस बार-बार दोहराई जाने वाली प्रवृत्ति को दर्शाता है जिसमें वह भारतीय संस्थानों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) जैसे सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों को अक्सर उचित व्यापक स्तर के साक्ष्यों के बिना, अत्यधिक नकारात्मक पहलुओं में चित्रित करता है।’’

इसमें कहा गया, ‘‘इससे विश्लेषणात्मक संतुलन को लेकर जायज़ चिंताएं उठती हैं। आरएसएस, जिसकी जमीनी स्तर पर व्यापक उपस्थिति है और जिसने सामाजिक सेवा एवं राष्ट्र निर्माण में योगदान दिया है, आलोचना का पात्र हो सकता है, लेकिन ऐसी आलोचना सत्यापन योग्य साक्ष्य और प्रासंगिक समझ पर आधारित होनी चाहिए, न कि केवल व्यापक सामान्यीकरणों पर।’’

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एक मजबूत न्यायिक प्रणाली और संस्थागत निगरानी के साथ दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते, भारत में धार्मिक अधिकारों के उल्लंघन को अनदेखा किए जाने की शायद ही गुंजाइश होती है।

बयान में कहा गया, ‘‘भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहाँ की सुदृढ़ और समय पर परखी गई न्यायिक प्रणाली, जीवंत लोकतांत्रिक संस्थाएँ और संसदीय निगरानी व्यवस्था को देखते हुए, किसी व्यक्ति या संगठन के लिए किसी के धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन करने के बाद बिना किसी दंड के बच निकलना बहुत मुश्किल है।’’

कुल 275 हस्ताक्षरकर्ताओं में 25 सेवानिवृत्त न्यायाधीश, 10 राजदूतों सहित 119 सेवानिवृत्त नौकरशाह और सशस्त्र बलों के 131 पूर्व अधिकारी शामिल हैं।

हस्ताक्षरकर्ताओं में उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जैसे न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल (जो पूर्व एनजीटी अध्यक्ष भी हैं) और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत और सुनील अरोड़ा, पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल, पूर्व एनआईए निदेशक योगेश चंद्र मोदी और कई सेवानिवृत्त आईएएस, आईपीएस और सशस्त्र बलों के अधिकारी शामिल हैं।

यह संयुक्त बयान पूर्व राजदूत भास्वती मुखर्जी और पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव एम मदन गोपाल के समन्वय से जारी किया गया।

भाषा

नेत्रपाल माधव

माधव