मातृभाषा दिवस की विडंबना: चुनावों से पहले बंगाल का राजनीतिक विमर्श गिरावट की ओर
मातृभाषा दिवस की विडंबना: चुनावों से पहले बंगाल का राजनीतिक विमर्श गिरावट की ओर
(प्रदीप्त तापदार)
कोलकाता, 21 फरवरी (भाषा) पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ तीखी राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। नीतिगत चर्चाओं को केंद्र में रखने की जगह एक दूसरे के खिलाफ निजी हमलों का इस्तेमाल हो रहा है।
बंगाल की राजनीति पहले तथ्यों और वैचारिक बहसों पर आधारित थी, तो आज सतही बातों का बोलबाला है। तृणमूल कांग्रेस, भाजपा, माकपा और कांग्रेस के नेता एक-दूसरे पर सार्वजनिक बहस का स्तर गिराने का आरोप लगा रहे हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि सभी दल इसमें शामिल हैं।
अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का विरोधाभास साफ नजर आता है: वह भूमि, जिसने नोबेल पुरस्कार से सम्मानित रवींद्रनाथ ठाकुर और कवि काजी नजरुल इस्लाम को जन्म दिया, आज तीखे बयानबाजी के लिए चर्चा में है जो तर्कों से ज्यादा तेजी से वायरल हो जाती हैं।
राज्य के संसदीय कार्य मंत्री शोभनदेब चट्टोपाध्याय (82) ने इस गिरावट को स्वीकार किया, लेकिन इसे एक व्यापक सामाजिक बदलाव के रूप में प्रस्तुत किया।
तृणमूल नेता ने कहा, “पहले हम विचारधाराओं और राजनीतिक रास्तों की आलोचना करते थे, लेकिन अपमानजनक तरीके से नहीं। लोगों में सहनशीलता और धैर्य में गंभीर गिरावट आई है। नेताओं को याद रखना चाहिए कि आज बोले गए शब्द कल उल्टा पड़ सकते हैं।”
चट्टोपाध्याय ने तर्क दिया कि एक समय बहस सिद्धांतों पर केंद्रित होती थी, जबकि ‘अब राजनीति काफी हद तक सत्ता के लिए होड़ बन गई है।’ इस परिवर्तन के बारे में उनका मानना है कि इसने भाषा को अनिवार्य रूप से प्रभावित किया है।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा कि व्यक्तिगत आरोप ठोस आलोचना का स्थान ले रहे हैं।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रदीप भट्टाचार्य (81) ने मौजूदा स्थिति को ‘अब तक का सबसे निम्न स्तर’ बताया और अफसोस जताया कि वैचारिक प्रतिस्पर्धा की जगह व्यक्तिगत हमलों ने ले ली है।
उन्होंने कहा, “इस गिरावट का एक प्रमुख कारण राजनीतिक नेताओं के बौद्धिक स्तर में कमी आना है। पहले नेता साहित्य, दर्शन और इतिहास पढ़ते थे। उनमें बौद्धिक अनुशासन और व्यापक दृष्टिकोण होता था। आज राजनीति तात्कालिक और सतही बातों तक ही सीमित है।”
तृणमूल नेता कुणाल घोष ने तर्क दिया कि यह बिगड़ती स्थिति कल से शुरू नहीं हुई है। उन्होंने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के लंबे कार्यकाल को टकरावपूर्ण राजनीतिक व्यवहार को संस्थागत रूप देने का दोषी ठहराया और दावा किया कि विपक्ष अब उस संस्कृति की शिकायत कर रहा है जिसे उसने कभी खुद पोषित किया था।
बंगाल को कभी बी सी रॉय, ज्योति बसु, प्रणब मुखर्जी, प्रफुल्ल सेन, अजय मुखर्जी, सोमनाथ चटर्जी, सिद्धार्थ शंकर रे, इंद्रजीत गुप्ता और भूपेश गुप्ता जैसे प्रभावशाली वक्ताओं पर गर्व था, जो विचारधारा में एक दूसरे से काफी भिन्न थे, लेकिन बहस को नीति और संवैधानिक बुनियाद पर आधारित रखते थे, और कभी भी व्यक्तिगत द्वेष में नहीं बदलते थे।
जैसे-जैसे 2026 के चुनाव नजदीक आ रहे हैं, कुछ जानकारों का मानना है कि अनिर्णायक मतदाताओं को लुभाने के लिए भाषा का लहजा नरम होता जाएगा, जबकि अन्य का मानना है कि जैसे-जैसे मुकाबला कड़ा होता जाएगा, हमले और तेज होते जाएंगे।
इस प्रकार अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस विडंबना से भरा हुआ है। नेता भाषाई गौरव और बंगाल की साहित्यिक विरासत का जश्न मनाते हैं, लेकिन फिर उसी भाषा को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं। अब चिंता मूल्यों की है – क्या बंगाल 2026 के विधानसभा चुनाव के तेज होने से पहले शालीनता और वैचारिक गहराई को पुनः प्राप्त कर पाएगा।
भाषा आशीष माधव
माधव

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