श्रीनगर, तीन सितंबर (भाषा) प्रतिबंधित जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के प्रमुख यासीन मलिक ने वर्ष 1990 के कश्मीरी पंडित महिला की हत्या के मामले में विशेष अदालत के समक्ष 25 पन्नों का हलफनामा दाखिल कर खुद को निर्दोष बताया और उसने मामले में बचाव करने से इनकार करते हुए मृत्युदंड देने का अनुरोध किया है।
दिल्ली की तिहाड़ जेल में कैद मलिक ने दावा किया कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप वैध पुलिस जांच से अधिक ‘‘मनगढ़ंत कहानी’’ लगते हैं और यह मामला दशकों बाद केवल उसे फंसाने के लिए तैयार किया गया।
मलिक ने हलफनामे में अपनी पत्नी मुशाल हुसैन मलिक से वैवाहिक संबंध खत्म करने के फैसला का भी जिक्र किया। उसने इसके पीछे की वजह लंबे समय से जेल में रहने और पिछले आठ वर्षों से परिवार से संवाद नहीं कर पाने को बताया। उसके अनुसार, उसे फोन कॉल या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा उपलब्ध नहीं थी।
मलिक ने इसी हलफनामे में अपनी पत्नी से कहा, ‘‘मुझे फांसी दिए जाने से पहले मैंने आपको अपने निकाह के बंधन से अलग करने का फैसला किया है।’’ उसने अपनी बेटी को दादा-दादी को हर दिन पांच मिनट फोन करने की सलाह भी दी।
तिहाड़ की केंद्रीय जेल संख्या सात में बंद मलिक ने सत्यापित और प्रमाणित हलफनामे में जारी मुकदमे की कार्यवाही में आगे बचाव नहीं करने का फैसला घोषित किया और कहा कि उसने अपना पूरा मामला ‘‘खुदा के हाथों में’’ सौंप दिया है।
अदालत में दाखिल हलफनामे में मलिक ने कहा, ‘‘अपने व्यक्तिगत हालात पर विचार करने और गहन चिंतन के बाद मैंने आगे की सुनवाई में मुकदमा नहीं लड़ने का फैसला किया है। मेरे इस फैसले को अभियोजन पक्ष के किसी तथ्य, अपराध में मेरी संलिप्तता या मेरे खिलाफ लगाए गए आरोपों की स्वीकारोक्ति नहीं माना जाए। मैं मृत्युदंड का अनुरोध करता हूं।’’
मलिक ने कहा कि राजनीतिक कारणों से उसे इस मामले में झूठा फंसाया गया है।
मलिक का यह हलफनामा राज्य जांच एजेंसी (एसआईए) द्वारा 29 जून को सरला भट की हत्या के मामले में आरोपपत्र दाखिल किए जाने के बाद आया है। 19 अप्रैल, 1990 को मारी गई कश्मीरी पंडित सरला भट की हत्या के मामले में मलिक को आरोपी बनाया गया है।
मलिक ने एसआईए के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए उन्हें तीन दशक से अधिक समय बाद गढ़ी गई ‘‘बाद की कहानी’’ करार दिया। उसने दावा किया कि अप्रैल 1990 में नरवारा में बीएसएफ की छापेमारी के दौरान इमारत से गिरने के बाद वह गंभीर रूप से घायल हो गया था और कोमा में चला गया था। उसने कहा कि सरकारी प्रसारक दूरदर्शन समेत कई समाचार माध्यमों ने उस समय उसके दो बार मारे जाने की खबर भी दी थी।
मलिक ने दावा किया, ‘‘यह समझ से परे है कि जो व्यक्ति बेहोश था, अपनी जिंदगी बचाने के लिए संघर्ष कर रहा था और जिसे व्यापक रूप से मृत मान लिया गया था, वह अपराध में शामिल कैसे हो सकता था, साजिश कैसे रच सकता था।’’
उसने कहा कि सरला भट एक निर्दोष नागरिक थीं और इस आरोप से इनकार किया कि वह सुरक्षा एजेंसियों की मुखबिर थीं।
मलिक ने कहा कि भट न तो गुप्त रूप से सुरक्षा बलों के लिए काम कर रही थीं और न ही नरवारा में हुई उस छापेमारी के लिए किसी तरह जिम्मेदार थीं, जहां वह ठहरा हुआ था।
मलिक ने कहा, ‘‘मेरे विचार से वह मेरी 13 वर्षीय बेटी रजिया सुल्तान की तरह ही एक निर्दोष नागरिक थीं।’’
उसने हत्या के तीन दशक से अधिक समय बाद मामले में आरोपी बनाए जाने पर हैरानी जताई।
आरोपपत्र दाखिल होने से पहले मलिक ने बताया कि एसआईए के तीन अधिकारियों ने तिहाड़ जेल में उससे मुलाकात की थी और केवल दो आरोपों को लेकर पूछताछ की थी। पहला, घटनास्थल से बरामद जेकेएलएफ का हस्तलिखित पत्र था, जिसमें संगठन ने हत्या की जिम्मेदारी लेने का दावा किया था और जावेद मीर, शेख अब्दुल हमीद तथा मोहम्मद यासीन मलिक के नाम का उल्लेख था। दूसरा आरोप यह था कि जेकेएलएफ ने भट की हत्या का आदेश दिया था क्योंकि उसे संदेह था कि उन्होंने हफीज बजाज के घर में मलिक की मौजूदगी की जानकारी सुरक्षा अधिकारियों को दी थी।
मलिक ने हलफनामे में कहा, ‘‘अगर यह हस्तलिखित पत्र, जिसे अब एसआईए सच मान रही है, कथित हत्या के घटनास्थल से बरामद हुआ था, तो अधिकारियों ने तीन दशक तक पत्र में उल्लिखित तीनों लोगों को आरोपी क्यों नहीं बनाया?’’
उन्होंने तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन का भी जिक्र किया और कहा कि कश्मीरी पंडित समुदाय के एक बड़े वर्ग की नजर में वह उनके रक्षक माने जाते थे, लेकिन उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि भट की हत्या के लिए मलिक जिम्मेदार था।
मलिक ने कहा कि अगस्त 1990 में उसकी गिरफ्तारी के समय उसके खिलाफ टाडा के तहत करीब दो दर्जन मामले दर्ज किए गए थे, लेकिन भट की हत्या के मामले में उसे कभी आरोपी नहीं बनाया गया।
हलफनामे के अनुसार, ‘‘यदि ऐसा आपत्तिजनक पत्र वास्तव में मौजूद था, तो जांच एजेंसियों के पास इस मामले को छोड़ने का कोई कारण नहीं था।’’
मलिक ने दावा किया कि हत्या के मामले में उसे आरोपी बनाने वाला जांच एजेंसी का आरोपपत्र महज बाद में गढ़ी गई कहानी है।
हलफनामे में दावा किया गया, ‘‘अभियोजन पक्ष की मौजूदा कहानी वास्तविक आपराधिक जांच के बजाय काल्पनिक कहानी जैसी लगती है, जिसे कई दशक बाद केवल मुझे इस मामले में झूठा फंसाने के उद्देश्य से सावधानीपूर्वक तैयार किया गया।’’
भाषा
राखी माधव
माधव