कर्नाटक के राज्यपाल ने दो पंक्तियों में समाप्त किया संबोधन, मुख्यमंत्री ने की आलोचना

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कर्नाटक के राज्यपाल ने दो पंक्तियों में समाप्त किया संबोधन, मुख्यमंत्री ने की आलोचना

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  • Publish Date - January 22, 2026 / 02:51 PM IST,
    Updated On - January 22, 2026 / 02:51 PM IST

(तस्वीरों के साथ जारी)

बेंगलुरु, 22 जनवरी (भाषा) कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने बृहस्पतिवार को यहां राज्य विधानमंडल के संयुक्त सत्र में अपना परंपरागत संबोधन केवल दो शुरुआती पंक्तियां पढ़कर समाप्त कर दिया जिसे लेकर मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने कड़ी प्रतिक्रिया दी।

सिद्धरमैया ने गहलोत पर राज्य सरकार द्वारा तैयार भाषण के बजाय अपना खुद का भाषण पढ़ने का आरोप लगाते हुए कहा कि राज्यपाल संविधान द्वारा निर्धारित अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में विफल रहे हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि राज्यपाल ने सरकार द्वारा तैयार पूरा भाषण नहीं पढ़कर संविधान का उल्लंघन किया है और वह केंद्र सरकार के हाथों की ‘‘कठपुतली’’ की तरह काम कर रहे हैं।

पिछले दो दिन में दक्षिण भारत के गैर-भाजपा (भारतीय जनता पार्टी) शासित राज्यों में राज्यपाल और सरकार के बीच टकराव की यह तीसरी घटना है। कर्नाटक के अलावा केरल एवं तमिलनाडु में भी ऐसा हो चुका है।

विधानसभा और विधान परिषद के संयुक्त सत्र में अपने संक्षिप्त भाषण के बाद गहलोत बाहर चले गए। इस बीच राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस सदस्यों ने उनका विरोध किया और उनका घेराव करने की भी कोशिश की।

इससे पहले, राज्यपाल ने सिद्धरमैया, विधानसभा अध्यक्ष यू. टी. खादर, विधान परिषद के सभापति बसवराज होराट्टी, विपक्ष के नेताओं, मंत्रियों और सदस्यों का अभिवादन करते हुए भाषण शुरू किया।

उन्होंने हिंदी में कहा, ‘‘मुझे कर्नाटक विधानमंडल के एक और संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए प्रसन्नता हो रही है। मेरी सरकार राज्य के आर्थिक, सामाजिक एवं भौतिक विकास को दोगुना करने के लिए प्रतिबद्ध है। जय हिंद, जय कर्नाटक।’’

यह कहकर वह बाहर चले गए।

कांग्रेस सदस्यों ने सरकार द्वारा तैयार भाषण पढ़े बिना राज्यपाल के चले जाने पर कड़ी नाराजगी जताई और सदन में इसके खिलाफ नारे लगाए। वहीं, राज्यपाल का बचाव करते दिख रहे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सदस्यों ने ‘‘भारत माता की जय’’ के नारे लगाए।

गहलोत के इस कदम पर सिद्धरमैया ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए आरोप लगाया कि राज्यपाल अपने संवैधानिक दायित्वों एवं जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में विफल रहे।

राज्यपाल के बाहर जाते समय विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) बी. के. हरिप्रसाद समेत कांग्रेस के कुछ सदस्यों ने नारे लगाते हुए उन्हें घेरने की कोशिश की। सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें हटाया।

मुख्यमंत्री ने बाद में आरोप लगाया कि राज्यपाल ने राज्य सरकार द्वारा तैयार भाषण के बजाय अपना भाषण पढ़ा और वह संवैधानिक अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार द्वारा तैयार पूरा भाषण नहीं पढ़कर राज्यपाल ने संविधान का उल्लंघन किया और वह केंद्र सरकार के हाथों में ‘‘कठपुतली’’ की तरह काम कर रहे हैं।

सिद्धरमैया ने संवाददाताओं से कहा, ‘‘हर नए साल में राज्यपाल को संयुक्त सत्र को संबोधित करना होता है और उन्हें राज्य मंत्रिमंडल द्वारा तैयार भाषण पढ़ना होता है। यह संवैधानिक है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 176 और अनुच्छेद 163 में कहा गया है कि राज्यपाल सरकार या मंत्रिमंडल द्वारा तैयार किया गया भाषण पढ़ेंगे।’’

उन्होंने कहा, ‘‘आज उन्होंने मंत्रिमंडल द्वारा तैयार भाषण पढ़ने के बजाय स्वयं का तैयार किया हुआ भाषण दिया। यह भारतीय संविधान के प्रावधानों के विरुद्ध है। यह संविधान के अनुच्छेद 176 और 163 का स्पष्ट उल्लंघन है इसलिए यह राज्यपाल का भाषण नहीं माना जा सकता। उन्होंने संविधान के अनुसार अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं किया। उन्होंने भारतीय संविधान द्वारा निर्धारित अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं किया।’’

मुख्यमंत्री ने कहा, ‘‘इसलिए हम राज्यपाल के इस रुख का विरोध करेंगे। हम इस पर विचार कर रहे हैं कि उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाए या नहीं। हम आपको सूचित करेंगे।’’

लोक भवन और कांग्रेस नीत राज्य सरकार के बीच जारी तनावपूर्ण गतिरोध के बीच यह घटनाक्रम हुआ। यह गैर-भाजपा शासित राज्यों में निर्वाचित सरकारों और लोक भवन के बीच टकराव की ताजा घटना है। पिछले दो दिन में यह इस प्रकार की तीसरी घटना है।

तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि मंगलवार को वर्ष के पहले सत्र के पहले दिन यह कहते हुए विधानसभा में अपना पारंपरिक अभिभाषण दिए बिना ही सदन से बाहर चले गए थे कि अभिभाषण के पाठ में ‘‘गलतियां’’ थीं।

इसी प्रकार, केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने अपने भाषण के कुछ हिस्सों को ‘‘छोड़’’ दिया था और लोक भवन ने दावा किया कि राज्यपाल के सुझावों को अभिभाषण के मूल मसौदे से हटा दिया गया था।

गहलोत ने राज्य विधानमंडल के संयुक्त सत्र को संबोधित करने से बुधवार को इनकार कर दिया था। उन्होंने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को केंद्र द्वारा ‘‘निरस्त’’ किए जाने संबंधी कुछ संदर्भों पर आपत्ति जताई थी।

सूत्रों के मुताबिक, सरकार द्वारा तैयार किए गए भाषण में मनरेगा को रद्द करने और निधियों के हस्तांतरण से संबंधित मुद्दों पर कुल 11 पैराग्राफ हैं जिनसे राज्यपाल नाराज थे और वे इन्हें हटवाना चाहते थे।

मंत्री के. एच. पाटिल के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने गतिरोध को तोड़ने के प्रयास में गहलोत से मुलाकात की थी।

भाषा

सिम्मी नरेश

नरेश