रणथम्भौर की दीर्घायु बाघिन टी-39: साहस और जीवटता की जीवित मिसाल

रणथम्भौर की दीर्घायु बाघिन टी-39: साहस और जीवटता की जीवित मिसाल

रणथम्भौर की दीर्घायु बाघिन टी-39: साहस और जीवटता की जीवित मिसाल
Modified Date: June 25, 2026 / 02:56 pm IST
Published Date: June 25, 2026 2:56 pm IST

जयपुर, 25 जून (भाषा) रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान में बाघिन मछली के बाद अब बाघिन टी-39 ने अपने असाधारण जीवट से नई मिसाल कायम की है। लगभग 18 वर्ष की आयु में टी-39 रणथम्भौर की सबसे दीर्घायु बाघिनों में शामिल हो गई है। वन विभाग के अधिकारियों ने यह जानकारी दी।

अधिकारियों के अनुसार, आमतौर पर जंगल में बाघ 10 से 15 वर्ष तक ही जीवित रहते हैं, लेकिन टी-39 ने बिना किसी बाहरी सहायता या मानवीय हस्तक्षेप के इतना लंबा जीवन जीकर अद्भुत जीवटता और प्रकृति के साथ सामंजस्य का प्रमाण दिया है। मछली बीस साल की उम्र तक जीवित रही थी।

वन विभाग के अनुसार हाल के समय में टी-39 के व्यवहार में बदलाव देखा गया है। वह अब जंगल के बाहरी क्षेत्रों में अधिक दिखाई दे रही है। यह बढ़ती उम्र का संकेत हैं, जब बाघिनें शांत स्थानों की तलाश करती हैं और अपने क्षेत्र से धीरे—धीरे दूरी बना लेती हैं।

बाघिन टी—39 अब गाढ़ा डूब, पटवा बावड़ी और कुंडी क्षेत्र में देखी जा रही है।

अधिकारियों ने बताया कि वन विभाग की टीमें उसकी गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए हुए हैं ताकि उसकी और आस—पास के लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान के उप वन संरक्षक मानस सिंह ने कहा, ” टी-39 ने अपने जीवनकाल में तीन बार शावकों को जन्म दिया जो उद्यान के बाघों की पीढ़ी को आगे बढ़ाने में उसका महत्वपूर्ण योगदान है।”

उन्होंने बताया कि टी—39 की तुलना प्रसिद्ध बाघिन ‘मछली’ से की जाती है, जिसने संरक्षण की दुनिया में एक अलग पहचान बनाई थी। लेकिन टी-39 का जीवन और भी उल्लेखनीय है क्योंकि उसने पूरी तरह प्राकृतिक परिस्थितियों में इतना लंबा जीवन जिया है।

मानस ने बताया कि टी—39 को कोई सहायता नहीं दी गयी और ना ही खाने की व्यवस्था की गयी। इसके अलावा वह ना ही कभी बीमारी हुई और उसे कोई चिकित्सा उपलब्ध भी नहीं कराई गई।

मानस ने कहा, ” टी-39 का जीवन साहस, आत्मनिर्भरता और प्रकृति के साथ सामंजस्य का प्रतीक है। उसने यह साबित किया है कि वन्यजीव अपने प्राकृतिक वातावरण में भी लंबा और स्वस्थ जीवन जी सकते हैं।”

उन्होंने कहा कि रणथम्भौर के लिए टी-39 सिर्फ एक बाघिन ही नहीं, बल्कि एक जीवित विरासत है।

उपवन संरक्षक ने बताया कि टी-39 की तुलना अक्सर प्रसिद्ध बाघिन मछली (टी-16) से की जाती है, जिसने करीब 20 वर्षों तक जीवित रहकर दुनिया के सबसे वृद्ध बाघों में जगह बनाई थी। यह अपने आप में एक रिकॉर्ड था।

वन विभाग के अनुसार, बाघिन मछली का सबसे चर्चित कारनामा 2003 में सामने आया था जब उसने रणथम्भौर की एक झील में 14 फुट लंबे मगरमच्छ से मुकाबला कर उसे मार डाला था।

इस घटना ने उसे “क्रोकोडाइल किलर” और “लेडी ऑफ द लेक” की उपाधि दिलाई। मछली ने 11 शावकों को जन्म दिया और उनकी परवरिश कर रणथम्भौर की बाघ आबादी को स्थिर और मजबूत बनाए रखा। वर्ष 2016 में उसकी मौत हो गयी।

भाषा बाकोलिया वैभव नरेश

नरेश


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