भारत की अनेक भाषाओं ने सभ्यतागत लोकाचार को संरक्षित रखने में मदद की : उपराष्ट्रपति

भारत की अनेक भाषाओं ने सभ्यतागत लोकाचार को संरक्षित रखने में मदद की : उपराष्ट्रपति

भारत की अनेक भाषाओं ने सभ्यतागत लोकाचार को संरक्षित रखने में मदद की : उपराष्ट्रपति
Modified Date: January 9, 2026 / 08:43 pm IST
Published Date: January 9, 2026 8:43 pm IST

(फाइल फोटो के साथ)

नयी दिल्ली, नौ जनवरी (भाषा) उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन ने शुक्रवार को कहा कि भारत की अनेक भाषाओं ने देश को कभी विभाजित नहीं किया, बल्कि एक साझा सभ्यतागत लोकाचार और एक सामान्य ‘धर्म’ को संरक्षित एवं सुदृढ़ किया है।

राधाकृष्णन ने कहा कि संविधान और उसकी आठवीं अनुसूची भाषाई विविधता को मान्यता देकर और उसका सम्मान करके भारत के प्राचीन ज्ञान को प्रतिबिंबित करती है और इस बात की पुष्टि करती है कि राष्ट्रीय एकता एकरूपता पर नहीं, बल्कि आपसी सम्मान पर टिकी है।

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उन्होंने कहा कि लोकतंत्र तब फलता-फूलता है, जब हर नागरिक अपनी भाषा में स्वयं को अभिव्यक्त कर सके।

राधाकृष्णन ने नयी दिल्ली में भारतीय भाषाओं पर तीसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए ये टिप्पणियां कीं।

राज्यसभा के सभापति के रूप में संसद के अपने पहले सत्र का अनुभव साझा करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि अब अधिक संख्या में सांसद अपनी-अपनी मातृभाषाओं में विचार व्यक्त कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने हाल में संथाली भाषा में संविधान के अनुवाद की प्रति जारी की थी, जिसे उन्होंने भाषाई समावेशन और सभी भाषा समुदायों के लोकतांत्रिक सम्मान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।

समकालीन चुनौतियों को रेखांकित करते हुए उन्होंने आगाह किया कि दुनिया भर में कई स्वदेशी भाषाओं पर लुप्त होने का खतरा है।

उन्होंने रेखांकित किया कि हर भारतीय भाषा ने दर्शन, चिकित्सा, विज्ञान, शासन और अध्यात्म में गहरा योगदान दिया है।

भाषा सिम्मी दिलीप

दिलीप


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