चुनाव के बाद तृणमूल के पहले बड़े विरोध प्रदर्शन में कई विधायक अनुपस्थित, सियासी हलचल तेज

चुनाव के बाद तृणमूल के पहले बड़े विरोध प्रदर्शन में कई विधायक अनुपस्थित, सियासी हलचल तेज

चुनाव के बाद तृणमूल के पहले बड़े विरोध प्रदर्शन में कई विधायक अनुपस्थित, सियासी हलचल तेज
Modified Date: May 20, 2026 / 05:44 pm IST
Published Date: May 20, 2026 5:44 pm IST

कोलकाता, 20 मई (भाषा) पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के पहले बड़े विरोध प्रदर्शन से पार्टी के कई विधायकों की अनुपस्थिति ने बुधवार को राजनीतिक हलचल पैदा कर दी है।

यह घटनाक्रम पार्टी के आंतरिक विचार-विमर्श के एक दिन बाद सामने आया है, जिसमें कथित तौर पर जनता से जुड़ने के लिए सड़क पर उतरने की राजनीति की ओर लौटने की आवश्यकता पर चर्चा हुई थी।

तृणमूल विधायकों के एक समूह ने विधानसभा परिसर में आंबेडकर प्रतिमा के पास ‘चुनावेत्तर हिंसा’ और फेरीवालों को हटाने के अभियानों के खिलाफ धरना दिया। पंद्रह वर्षों तक सत्ता में रहने के बाद यह पार्टी का पहला समन्वित आंदोलन था।

इस प्रदर्शन में शोभनदेब चट्टोपाध्याय, नयना बनर्जी, कुणाल घोष और ऋतब्रत बनर्जी शामिल थे।

हालांकि, 80 विधायकों में से केवल 35 ही कार्यक्रम में पहुंचे, जिससे राजनीतिक गलियारों में संगठन के भीतर संभावित मतभेदों को लेकर अटकलें तेज हो गईं। यह ऐसे समय में हुआ है जब पार्टी चुनावी हार के बाद खुद को फिर से संगठित करने की कोशिश कर रही है।

विपक्ष के नेता पद के लिए पार्टी की पसंद माने जा रहे शोभनदेब चट्टोपाध्याय ने आंतरिक कलह की अटकलों को खारिज करते हुए कहा कि कई विधायक संगठनात्मक जिम्मेदारियों और अन्य व्यावहारिक कारणों से कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके।

चट्टोपाध्याय ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “आज के कार्यक्रम में करीब 35 विधायक मौजूद थे। कई विधायक चुनाव बाद हिंसा प्रभावित इलाकों में कार्यकर्ताओं के साथ व्यस्त थे, इसलिए वे नहीं आ सके। इसके अलावा कार्यक्रम की सूचना सिर्फ एक दिन पहले दी गई थी, ऐसे में दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले विधायकों के लिए पहुंचना मुश्किल था।”

हालांकि, इस विरोध प्रदर्शन को इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि यह कालीघाट में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक के एक दिन बाद आयोजित किया गया।

पार्टी सूत्रों के अनुसार, बैठक में कई विधायकों ने कहा था कि तृणमूल कांग्रेस केवल रणनीतिक बैठकों के जरिए खुद को पुनर्स्थापित नहीं कर सकती और उसे जमीनी स्तर पर लोगों से दोबारा जुड़ने की जरूरत है।

पार्टी सूत्रों के अनुसार, पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की उपस्थिति में मंगलवार को हुई बैठक में कुछ विधायकों ने चुनाव में हार के बाद सड़क आंदोलन से पार्टी नेतृत्व की कथित अनुपस्थिति पर चिंता व्यक्त की।

कई विधायकों ने कथित तौर पर कहा कि ‘बंद कमरों में बैठकें करना’ उस पार्टी के लिए मददगार नहीं होगा जो अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को फिर से हासिल करना चाहती है।

सूत्रों ने बताया कि कालीघाट में हुई चर्चाओं में पार्टी के कुछ वर्गों के भीतर चुनाव के बाद नेतृत्व के राजनीतिक दृष्टिकोण को लेकर व्यापक चिंता भी झलकती है।

इस पृष्ठभूमि में बुधवार का विरोध प्रदर्शन केवल चुनाव बाद हिंसा और अतिक्रमण रोधी अभियानों के मुद्दे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका प्रतीकात्मक महत्व भी माना गया।

तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक पहचान लंबे समय तक आंदोलनों के जरिए बनी रही है। सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों से लेकर वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ सड़क पर चलाए गए अभियानों तक, पार्टी की राजनीति में जन आंदोलनों की अहम भूमिका रही है।

तृणमूल विधायकों ने विधानसभा में बी आर आंबेडकर की प्रतिमा के समक्ष धरना दिया। उन्होंने बेदखली अभियान, बुलडोजर से इमारतें ढहाने और चुनाव बाद कथित हिंसा का विरोध किया।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सत्ता परिवर्तन के बाद तृणमूल विधायकों के पहले बड़े विरोध प्रदर्शन में अपेक्षाकृत कम उपस्थिति ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि पार्टी लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद विपक्षी दल की भूमिका में खुद को कितनी प्रभावी ढंग से ढाल पाती है।

भाषा राखी रंजन

रंजन


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