भारत में 80 प्रतिशत से अधिक मनोरोगियों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता: आईपीएस

भारत में 80 प्रतिशत से अधिक मनोरोगियों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता: आईपीएस

भारत में 80 प्रतिशत से अधिक मनोरोगियों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता: आईपीएस
Modified Date: January 4, 2026 / 05:20 pm IST
Published Date: January 4, 2026 5:20 pm IST

नयी दिल्ली, चार जनवरी (भाषा) ‘इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी’ (आईपीएस) ने भारत में मानसिक स्वास्थ्य उपचार अंतराल के लगातार बहुत अधिक बने रहने पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि मनोरोग से पीड़ित लगभग 80-85 प्रतिशत लोगों को समय पर या उचित देखभाल नहीं मिल पाती है।

इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी के 77वें वार्षिक राष्ट्रीय सम्मेलन (एएनसीआईपीएस 2026) के पूर्व एक कार्यक्रम के दौरान यह तथ्य उजागर किया। यह सम्मेलन 28 से 31 जनवरी तक दिल्ली के यशोभूमि में आयोजित किया जाएगा।

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेताया है कि उपचार में प्रगति और बढ़ती जागरूकता के बावजूद, मानसिक बीमारी से पीड़ित अधिकांश लोग औपचारिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली से बाहर रह जाते हैं।

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राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएमएचएस) के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में उपचार अंतराल सबसे व्यापक अंतरालों में से एक है, जहां सामान्य मानसिक विकारों से पीड़ित 85 प्रतिशत से अधिक लोग उपचार नहीं करवा रहे हैं या उपचार प्राप्त नहीं कर रहे हैं।

वैश्विक संदर्भ में, मानसिक बीमारी से पीड़ित 70 प्रतिशत से अधिक लोगों को प्रशिक्षित स्वास्थ्य पेशेवरों से देखभाल नहीं मिल पाती है, और कम आय वाले कई देशों में जरूरतमंद लोगों में से 10 प्रतिशत से भी कम लोग वास्तव में आवश्यक उपचार प्राप्त कर पाते हैं।

भारत, अपनी विशाल जनसंख्या और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सीमित अवसंरचना के कारण इस चुनौती के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील बना हुआ है।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आईपीएस की अध्यक्ष डॉ. सविता मल्होत्रा ​​ने इस बात पर जोर दिया कि मानसिक रोग की यदि शीघ्र पहचान और उचित प्रबंधन हो तो इसका आसानी से उपचार हो सकता है।।

उन्होंने कहा, ‘‘मानसिक स्वास्थ्य विकार का आसानी से उपचार हो सकता है फिर भी भारत में अधिकांश मरीज चुपचाप पीड़ा सहते रहते हैं। 80 प्रतिशत से अधिक लोगों को समय पर मनोरोग संबंधी देखभाल न मिलना, लांछन, जागरूकता की कमी और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के अपर्याप्त एकीकरण को दर्शाता है।’’

इस कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने मानसिक स्वास्थ्य देखभाल प्राप्त करने में लंबी देरी के पीछे कई परस्पर जुड़े कारणों को रेखांकित किया।

आयोजन समिति के अध्यक्ष और मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान(इहबास) के पूर्व निदेशक डॉ. निमेष जी. देसाई ने उपचार में देरी या उसके अभाव के गंभीर परिणामों पर प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि जब मनोरोग संबंधी देखभाल में देरी होती है तो बीमारी अक्सर अधिक गंभीर और दीर्घकालिक हो जाती है, जिससे अधिक परेशानी, पारिवारिक संकट, उत्पादकता में कमी और आत्मविश्वास खोना और आत्महत्या का खतरा काफी बढ़ जाता है।

देसाई ने कहा, ‘‘मानसिक स्वास्थ्य को भी शारीरिक स्वास्थ्य के समान ही गंभीरता और तत्परता से संबोधित किया जाना चाहिए। सामुदायिक सेवाओं को मजबूत करना, प्राथमिक देखभाल डॉक्टरों को प्रशिक्षित करना और रेफरल प्रणालियों में सुधार करना इस अस्वीकार्य उपचार अंतर को पाटने के लिए आवश्यक कदम हैं।’’

भाषा आशीष संतोष

संतोष


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