मुर्मू ने भारत की 11 शास्त्रीय भाषाओं में पुस्तकों, पांडुलिपि के लिए ‘ग्रंथ कुटीर’ का उद्घाटन किया

मुर्मू ने भारत की 11 शास्त्रीय भाषाओं में पुस्तकों, पांडुलिपि के लिए ‘ग्रंथ कुटीर’ का उद्घाटन किया

मुर्मू ने भारत की 11 शास्त्रीय भाषाओं में पुस्तकों, पांडुलिपि के लिए ‘ग्रंथ कुटीर’ का उद्घाटन किया
Modified Date: January 23, 2026 / 10:05 pm IST
Published Date: January 23, 2026 10:05 pm IST

(तस्वीरों के साथ)

नयी दिल्ली, 23 जनवरी (भाषा) राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने औपनिवेशिक विरासत से छुटकारा पाने और भारत की 11 शास्त्रीय भाषाओं में लगभग 2,300 पुस्तकों और पांडुलिपियों के लिए एक समर्पित स्थान बनाने के राष्ट्रपति भवन के उपाय के तहत शुक्रवार को एक ‘ग्रंथ कुटीर’ का उद्घाटन किया।

राष्ट्रपति भवन द्वारा जारी एक बयान में कहा गया कि इस संग्रह में तमिल, संस्कृत, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम, ओडिया, मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बांग्ला भाषाओं की रचनाएं शामिल हैं तथा यह भारत की समृद्ध सांस्कृतिक, दार्शनिक, साहित्यिक और बौद्धिक विरासत को प्रतिबिंबित करता है।

इसमें कहा गया कि ‘ग्रंथ कुटीर’ में महाकाव्य, दर्शन, भाषा विज्ञान, इतिहास, शासन, विज्ञान और भक्ति साहित्य जैसे विषयों की एक विस्तृत श्रृंखला वाली पांडुलिपियां और पुस्तकें हैं, साथ ही शास्त्रीय भाषाओं में भारत का संविधान भी है।

इस संग्रह में ताड़ के पत्ते, कागज, छाल और कपड़े जैसी पारंपरिक सामग्रियों पर हस्तलिखित लगभग 50 पांडुलिपियां भी शामिल हैं।

बयान के अनुसार, हाल तक यहां विलियम होगार्थ की मूल कृतियों की सूची, लॉर्ड कर्ज़न ऑफ केडलस्टन के भाषण, लॉर्ड कर्ज़न ऑफ केडलस्टन के प्रशासन का सारांश, लॉर्ड कर्ज़न का जीवन जैसी पुस्तकें रखी जाती थीं।

अब इन्हें राष्ट्रपति भवन परिसर के भीतर एक अलग स्थान पर ‘‘स्थानांतरित’’ कर दिया गया है और अभिलेखीय संग्रह का हिस्सा होने के नाते इन पुस्तकों को डिजिटाइज़ कर दिया गया है तथा इन तक शोधकर्ताओं और विद्वानों को ऑनलाइन पहुंच उपलब्ध कराई जाएगी।

बयान में कहा गया, ‘‘ग्रंथ कुटीर का उद्देश्य भारत की सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत के बारे में जागरूकता बढ़ाना और औपनिवेशिक प्रभावों से मुक्ति पाने के राष्ट्रीय संकल्प के साथ तालमेल बिठाना है।’’

यह पहल ज्ञान भारतम मिशन का भी समर्थन करती है, जिसका उद्देश्य परंपरा और प्रौद्योगिकी को एकीकृत करके भारत की विशाल हस्तलिखित विरासत को संरक्षित करना, डिजिटाइज़ करना और प्रसारित करना है।

केंद्र सरकार ने 2024 में मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बांग्ला को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया था, जिससे देश में शास्त्रीय भाषाओं की कुल संख्या 11 हो गई थी।

बयान में कहा गया कि इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) पांडुलिपियों के संरक्षण, प्रलेखन और प्रदर्शन के लिए पेशेवर विशेषज्ञता प्रदान कर रहा है।

राष्ट्रपति मुर्मू ने इस अवसर पर अपने संबोधन में कहा कि शास्त्रीय भाषाओं ने भारतीय संस्कृति की नींव रखी है और विज्ञान, योग, आयुर्वेद तथा साहित्य के ज्ञान के माध्यम से सदियों से दुनिया का मार्गदर्शन किया है।

उन्होंने कहा कि तिरुक्कुरल और अर्थशास्त्र जैसे ग्रंथ आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं, जबकि पाणिनी का व्याकरण, आर्यभट्ट का गणित और चरक तथा सुश्रुत का चिकित्सा विज्ञान जैसे योगदान दुनिया को प्रेरित करते रहते हैं।

इन भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता पर जोर देते हुए राष्ट्रपति ने कहा, ‘‘शास्त्रीय भाषाओं में संचित ज्ञान का भंडार हमें अपने समृद्ध अतीत से सीखने और उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करने के लिए प्रेरित करता है।’’

उन्होंने विश्वविद्यालयों में शास्त्रीय भाषाओं के शिक्षण पर अधिक जोर देने, युवाओं को कम से कम एक शास्त्रीय भाषा सीखने के लिए प्रोत्साहित करने और पुस्तकालयों में इस तरह की अधिक कृतियों को उपलब्ध कराने का आह्वान किया।

भाषा

नेत्रपाल अविनाश

अविनाश


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