बसवन्ना के समतामूलक विचारों को आगे बढ़ाने की आवश्यकता : उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन

बसवन्ना के समतामूलक विचारों को आगे बढ़ाने की आवश्यकता : उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन

बसवन्ना के समतामूलक विचारों को आगे बढ़ाने की आवश्यकता : उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन
Modified Date: April 22, 2026 / 04:27 pm IST
Published Date: April 22, 2026 4:27 pm IST

बीदर, 22 अप्रैल (भाषा) उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने लोगों से 12वीं सदी के समाज सुधारक बसवन्ना के सार्वभौमिक दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने और समानता, करुणा तथा धर्म पर आधारित समाज के निर्माण की दिशा में कार्य करने का आह्वान किया है।

राधाकृष्णन ने बुधवार को कर्नाटक के बीदर जिले के भालकी स्थित श्री चन्नबसवाश्रम में हिरेमठ संस्थान के बसवलिंग पट्टादेवरु महास्वामीजी के अमृत महोत्सव समारोह में अपने संबोधन में यह बात कही।

उन्होंने बसवलिंग पट्टादेवरु महास्वामीजी के 75वें जन्मोत्सव के अवसर पर संत के सामाजिक और शैक्षिक योगदान की सराहना भी की।

राधाकृष्णन ने कहा कि बीदर का ऐतिहासिक महत्व बहुत अधिक है और यह बसवन्ना से जुड़ा हुआ है, जिन्होंने सामाजिक भेदभाव का पुरजोर विरोध किया और एक समतावादी समाज के निर्माण की दिशा में काम किया।

उन्होंने कहा, “इस अवसर पर हमें बसवन्ना के सार्वभौमिक दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने का संकल्प लेना चाहिए-ऐसा समाज बनाना चाहिए जो समानता, करुणा और धर्म पर आधारित हो।”

उपराष्ट्रपति ने कहा कि कल्याण की इस पवित्र भूमि पर बसवन्ना ने ‘अनुभव मंडप’ का आयोजन किया था, जिसे विश्व का पहला आध्यात्मिक मंच माना जाता है। उन्होंने कहा कि इसके आदर्श आज भी कई पीढ़ियों को प्रेरित कर रहे हैं।

राधाकृष्णन ने बसवलिंग पट्टादेवरु को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उन्होंने अपना जीवन सेवा और करुणा को समर्पित किया है। पट्टादेवरु ने 500 से अधिक अनाथ और परित्यक्त बच्चों की देखभाल की तथा 60 से अधिक शैक्षणिक संस्थानों का नेटवर्क स्थापित किया, जिसमें 20,000 से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत हैं।

उन्होंने कहा कि महास्वामीजी ने अपने लेखन, उपदेश, यात्राओं और प्रकाशनों के माध्यम से समानता और आध्यात्मिक ज्ञान का संदेश व्यापक स्तर पर फैलाया है और उनका नेतृत्व केवल आध्यात्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है।

उपराष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा दिए गए ‘विकास भी, विरासत भी’ के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए कहा कि यह विकास और सांस्कृतिक विरासत को साथ लेकर चलने पर जोर देता है।

उन्होंने कहा कि यह दृष्टिकोण उस पुरानी सोच को चुनौती देता है जिसमें आधुनिकता के लिए सांस्कृतिक जड़ों से दूरी बनाने की आवश्यकता मानी जाती थी।

राधाकृष्णन ने कहा, ‘‘ इसके बजाय, यह एक ऐसा दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है जहां भारत तकनीकी रूप से उन्नत, आर्थिक रूप से मजबूत और वैश्विक स्तर पर प्रभावशाली होने के साथ-साथ अपनी सभ्यतागत विरासत से गहराई से जुड़ा रहे। ’’

राधाकृष्णन ने कहा कि मंदिरों, त्योहारों, योग और सांस्कृतिक धरोहरों पर नए सिरे से जोर देने से करोड़ों भारतीयों में गर्व की भावना विकसित हुई है जबकि तीर्थ कॉरिडोर के विकास और विरासत स्थलों के संरक्षण जैसी पहल से भारत की आध्यात्मिक विरासत के प्रति जागरुकता बढ़ी है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि बीदर में महिला जिलाधिकारी का होना खुशी की बात है और महिलाओं का सशक्तीकरण केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि पूरे समाज का सशक्तिकरण है।

उन्होंने कहा, “हर क्षेत्र में महिलाएं मातृत्व, सहानुभूति और करुणा का अनूठा समावेश लेकर आती हैं। जब महिलाएं आगे बढ़ती हैं, तो परिवार समृद्ध होते हैं, समाज मजबूत होता है और राष्ट्र प्रगति करता है।”

राधाकृष्णन ने कहा कि धार्मिक केंद्र अपनी गहरी जड़ों और व्यापक प्रभाव के कारण परिवर्तन के शक्तिशाली माध्यम बन सकते हैं और परंपरा तथा प्रगतिशील सोच के समन्वय से एक आध्यात्मिक रूप से समृद्ध, न्यायसंगत और समावेशी समाज के निर्माण में योगदान दे सकते हैं।

उपराष्ट्रपति ने कहा, “आइए हम सभी ‘तुम और मैं एक हैं’ की भावना के साथ मिलकर कार्य करें। स्वामीजी के 75वें जन्मोत्सव का यह अवसर केवल एक मील का पत्थर नहीं, बल्कि सत्य, सेवा और मानवता को समर्पित जीवन का सम्मान है।”

राधाकृष्णन ने कहा कि अपने लिए जीना गलत नहीं है, लेकिन केवल अपने लिए जीना व्यापक हित के प्रति अन्याय है। उन्होंने कहा कि बसवलिंग पट्टादेवरु ने निस्वार्थ सेवा का जीवन जिया और समाज तथा मानवता के कल्याण के लिए स्वयं को समर्पित किया।

उन्होंने कहा, “आइए हम उनके श्रेष्ठ विचारों से प्रेरणा लें और अपने-अपने स्तर पर एक अधिक करुणामय, समतामूलक और समावेशी समाज के निर्माण के लिए संकल्पित हों।”

भाषा रवि कांत रवि कांत नरेश

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