नौ-सदस्यीय संविधान पीठ धार्मिक स्थलों पर महिलाओं से भेदभाव संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई करेगी

नौ-सदस्यीय संविधान पीठ धार्मिक स्थलों पर महिलाओं से भेदभाव संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई करेगी

नौ-सदस्यीय संविधान पीठ धार्मिक स्थलों पर महिलाओं से भेदभाव संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई करेगी
Modified Date: February 16, 2026 / 04:09 pm IST
Published Date: February 16, 2026 4:09 pm IST

नयी दिल्ली, 16 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि नौ-सदस्यीय संविधान पीठ केरल के शबरिमला मंदिर सहित विभिन्न धर्मों में और धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से संबंधित याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई शुरू करेगी।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि यह पीठ सात अप्रैल को विभिन्न याचिकाओं पर महत्वपूर्ण सुनवाई शुरू करेगी।

इसने कहा कि सुनवाई 22 अप्रैल को पूरी होने की संभावना है।

पीठ ने संबद्ध पक्षों को 14 मार्च या इससे पहले अपने लिखित अभ्यावेदन दाखिल करने को कहा।

केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उन्होंने शबरिमला से संबंधित उस फैसले पर पुनर्विचार के अनुरोध का समर्थन किया है, जिसमें केरल के इस पवित्र पर्वतीय मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी गई थी।

शबरिमला फैसले की समीक्षा का समर्थन करने वाले पक्षों के लिए पीठ ने वकील कृष्ण कुमार सिंह को नोडल अधिवक्ता नियुक्त किया।

वहीं, फैसले की समीक्षा का विरोध करने वालों के लिए शाश्वती परी को नोडल अधिवक्ता बनाया गया है।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘हम यह उचित समझते हैं कि वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर और शिवम सिंह को ‘न्याय मित्र’ नियुक्त किया जाए। सिंह इस न्यायालय के समक्ष सभी पक्षों के विचार प्रस्तुत करेंगे।’’

आदेश में कहा गया, ‘‘नौ-सदस्यीय पीठ सात अप्रैल, 2026 को सुबह 10:30 बजे शबरिमला मामले में पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई शुरू करेगी। पुनर्विचार याचिकाकर्ताओं या उनके समर्थकों के पक्ष को सात अप्रैल से नौ अप्रैल तक सुना जाएगा। पुनर्विचार याचिकाओं का विरोध करने वालों की सुनवाई 14 से 16 अप्रैल तक होगी। यदि कोई प्रतिवाद प्रस्तुत करना हो तो उसकी सुनवाई 21 अप्रैल, 2026 को होगी, जिसके बाद न्याय-मित्र द्वारा अंतिम और निर्णायक अभ्यावेदन दिए जाएंगे… जिसके 22 अप्रैल तक पूरा होने की उम्मीद है।’’

पीठ ने दोनों पक्षों के वकीलों को समय-सीमा का पालन करने का निर्देश दिया।

शीर्ष अदालत ने 11 मई, 2020 को कहा था कि शबरिमला मंदिर प्रवेश मामले में समीक्षा क्षेत्राधिकार के तहत अपनी सीमित शक्ति का प्रयोग करते हुए, उसकी पांच-न्यायाधीशों की पीठ के पास विधि के प्रश्नों को निर्णय के लिए एक बड़ी पीठ को संदर्भित करने की शक्तियां हैं।

इससे दो महीने पहले, उच्चतम न्यायालय ने उन आपत्तियों को खारिज कर दिया था जिनमें कहा गया था कि 14 नवंबर, 2019 को पांच न्यायाधीशों की पीठ ने 2018 के शबरिमला फैसले से संबंधित पुनर्विचार याचिकाओं पर फैसला किए बिना मामले को वृहद पीठ के पास भेजकर गलती की थी। इस फैसले में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को केरल के पहाड़ी मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी।

इसमें विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे पर सात प्रश्न तैयार किए गए थे और यह स्पष्ट किया गया था कि इसमें तैयार किए गए मुद्दों को जोड़ने एवं हटाने की गुंजाइश है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि अन्य प्रश्नों के अलावा, वह इस बात की भी पड़ताल करेगी कि क्या कोई व्यक्ति, जो किसी धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह से संबंधित नहीं है, जनहित याचिका दायर करके उस ‘‘धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह’’ की किसी प्रथा पर सवाल उठा सकता है।

शबरिमला मामले के अलावा, फैसले में मुस्लिम महिलाओं के मस्जिदों और दरगाहों में प्रवेश तथा गैर-पारसी पुरुषों से विवाहित पारसी महिलाओं को अज्ञारी के पवित्र अग्निस्थल में प्रवेश से प्रतिबंधित किए जाने के मुद्दों को भी वृहद पीठ के समक्ष संदर्भित किया गया था।

भाषा नेत्रपाल सुरेश

सुरेश


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