पर्यावरण मंजूरी मिलने की अवधि को तीन साल से घटाकर तीन महीने किया गया है : भूपेन्द्र यादव
पर्यावरण मंजूरी मिलने की अवधि को तीन साल से घटाकर तीन महीने किया गया है : भूपेन्द्र यादव
नयी दिल्ली, 10 मार्च (भाषा) पर्यावरण मंत्री भूपेन्द्र यादव ने अरावली पर्वतमाला की सुरक्षा को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता जताते हुए राज्यसभा में मंगलवार को कहा कि पर्यावरण मंजूरी मिलने को लेकर पहले करीब तीन साल का समय लग जाता था, जिसे नरेन्द्र मोदी सरकार ने घटाकर तीन महीने कर दिया है।
उच्च सदन में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के कामकाज पर चर्चा का जवाब देते हुए मंत्री ने कहा कि जब 2014 में नरेन्द्र मोदी सरकार आयी थी, तब देश में संरक्षित क्षेत्रों की संख्या 757 थी जो आज 2026 में बढ़कर 1134 हो गयी है।
उन्होंने कहा कि 2014 में देश में कुल संरक्षित क्षेत्रफल 1,68,838 वर्ग किलोमीटर था जो 2026 में बढ़कर 1,87,162 वर्ग किलोमीटर हो गया। उन्होंने कहा कि देश में 2014 में राष्ट्रीय उद्यानों की संख्या 103 थी जो 2026 में बढ़कर 106 हो गये हैं।
यादव ने कहा कि इसी अवधि में वन्य जीव अभयारण्य की संख्या 539 से बढ़कर 574 हो गयी हैं।
उन्होंने कहा कि जब हम जल, जंगल और जमीन की बात करते हैं तो 2014 में जहां सामुदायिक आरक्षित क्षेत्र 48 थे जो आज बढ़कर 309 हो गये हैं।
पर्यावरण मंत्री ने माना कि पिछले 50 सालों में बाघ सरंक्षण को लेकर सभी सरकारों ने अच्छे प्रयास किये। उन्होंने कहा कि 2014 में बाघों की संख्या 2226 थी जो 2026 में बढ़कर 3682 हो गयी है। उन्होंने कहा कि विश्व के 70 प्रतिशत वन क्षेत्रों में रहने वाले 75 प्रतिशत बाघ भारत के पास है।
उन्होंने कहा कि 2014 में देश में बाघ अभयारण्यों की संख्या 47 थी जो आज बढ़कर 58 हो गयी है।
पर्यावरण मंत्री ने कहा कि सरकार ने देश में पहली बार नदी डॉल्फिन की संख्या का अनुमान लगवाया है और 2025 में यह संख्या करीब 6327 होने का अनुमान है।
उन्होंने भारतीय वन सर्वेक्षण की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि 2013-14 में देश में वन क्षेत्र का आकार 7,01,673 वर्ग किलोमीटर था, जो 2021-22 में बढ़कर 7,15,342 वर्ग किमी हो गया है।
यादव ने कहा कि 2014 में देश में 26 आर्द्र भूमि थी जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार द्वारा किये गये प्रयासों के कारण आज 98 आर्द्र भूमि को रामसर स्थल का दर्जा मिला है।
उन्होंने कहा कि सरकार अरावली पर्वतमाला की सुरक्षा और वहां हरियाली बढ़ाने को लेकर पूरी तरह से प्रतिबद्ध है तथा इस क्षेत्र में वह अवैध खनन नहीं होने देगी। अरावली में अवैध खनन के आरोपों को लेकर कांग्रेस के जयराम रमेश और उनके बीच कई बार आरोप प्रत्यारोप हुए।
यादव ने कहा कि देश के पर्यावरण क्षेत्र की तीन प्रमुख चुनौतियां थीं जिनमें पर्यावरण मंजूरी के विषय, वन एवं जैव विविधता के विषय और जलवायु परिवर्तन के विषय शामिल हैं। उन्होंने कहा कि इन विषयों के समाधान के लिए सभी विभागों को समग्रता से लेकर अपना रवैया तय किया।
मंत्री ने कहा कि सरकार ने पर्यावरण के क्षेत्र मानक तय करने की मांग को देखते हुए पिछले दो साल में कुछ दिशानिर्देश जारी किए हैं।
उन्होंने कहा कि देश में एक समय था जब पर्यावरण मंजूरी लेने में 600 दिन का समय लगता था और यदि कोई उद्योग लगाना चाहता था तो उसे इस मंजूरी को लेने में कई बार तीन साल का समय लगता है। उन्होंने कहा कि आज पर्यावरण मंजूरी 90 दिनों के भीतर मिल जाती है।
उन्होंने कहा, ‘‘तीन साल की अवधि को तीन माह में ला दिया।’’ उन्होंने कहा कि यह परिवेश में पारदर्शिता और प्रदर्शन के कारण संभव हुआ है।
यादव ने कहा कि सरकार ने उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बाद भोपाल में यूनियन कार्बाइड का खतरनाक कचरा पिछले दो सालों में पूरी तरह से निस्तारित कर दिया।
पर्यावरण मंत्री ने जब यह बात कही, तो उस समय कृषि मंत्री एवं मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सदन में मौजूद थे और उन्होंने कहा कि भोपाल में, मप्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार यह सब छोड़कर गयी थी। इस पर यादव ने कहा, ‘‘यह तो बहुत कुछ छोड़कर गये थे, जिसे हम साफ कर रहे हैं।’’
इस बीच, आसन की अनुमति से बोलते हुए कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने मंत्री को याद दिलाया कि जब वह यह काम कर रहे थे तो मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और राज्य सरकार ने उस पर आपत्ति की थी।
रमेश की बात का प्रतिवाद करते हुए कृषि मंत्री चौहान ने कहा कि इतिहास तो यह है कि लोग यूनियन कार्बाइड से रिसाव की शिकायत करते रहे, चेतावनी देते रहे, किंतु तब की कांग्रेस सरकार और मुख्यमंत्री सोते रहे।
इससे पहले, चर्चा में भाग लेते हुए कांग्रेस के नीरज डांगी ने अरावली पर्वतमाला के बारे में उच्चतम न्यायालय के निर्णय का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि इस मामले में सरकार ने जो कदम उठाये हैं, वह किसे मदद पहुंचाने के लिए उठाये गये थे।
डांगी ने कहा कि इस मामले में जनाक्रोष को देखते हुए सरकार को झुकना पड़ा और अपना रुख बदलना पड़ा। उन्होंने कहा कि यह सोचकर आश्चर्य होता है कि यदि जनता ने विरोध नहीं किया होता तो इस मामले में क्या परिणाम होता।
उन्होंने कहा कि हाल में केंद्र सरकार ने अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में एक विशाल अवसंरचना परियोजना को मंजूरी दी है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस क्षेत्र में वन एवं पर्यावरण को लेकर अत्यधिक चिंता व्यक्त की है।
कांग्रेस सांसद ने कहा कि सोनिया गांधी ने आलेख लिखकर कहा है कि निकोबार परियोजना सरकार के उन सब गलत कामों में अग्रणी है तथा 72 हजार करोड़ रूपये की यह परियोजना द्वीप के आदिवासियों के वजूद को ही खतरे में डालता है।
उन्होंने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के आलेख का हवाला देते हुए कहा कि यह निकोबार द्वीप के पेड़-पौधों एवं जीव-जंतुओं को भी खतरे में डाल देगा। उन्होंने कहा कि इस परियोजना को बिना सोचे समझे आगे बढ़ाया गया है।
भाषा
माधव सुभाष
सुभाष

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