जंतर-मंतर के आसपास इंटरनेट बंद करने के खिलाफ दाखिल याचिका वापस ली गई

जंतर-मंतर के आसपास इंटरनेट बंद करने के खिलाफ दाखिल याचिका वापस ली गई

जंतर-मंतर के आसपास इंटरनेट बंद करने के खिलाफ दाखिल याचिका वापस ली गई
Modified Date: July 27, 2026 / 02:10 pm IST
Published Date: July 27, 2026 2:10 pm IST

नयी दिल्ली, 27 जुलाई (भाषा) कानूनी सहायता संगठन ‘सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर’, इंडिया ने सोमवार को दिल्ली उच्च न्यायालय से जंतर-मंतर और उसके आसपास के इलाकों में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बंद किए जाने के खिलाफ दायर अपनी जनहित याचिका वापस ले ली।

कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) का प्रदर्शन समाप्त होने के बाद इन क्षेत्रों में इंटरनेट सेवाएं बहाल कर दी गई हैं।

मुख्य न्यायाधीश डी के उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने कहा, ‘‘याचिकाकर्ता के वकील ने याचिका वापस लेने के निर्देश होने की बात कही है। ऐसे में याचिका को वापस लिया हुआ मानते हुए खारिज किया जाता है।’’

याचिका में ‘सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर’, इंडिया ने केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा 17, 20, 22 और 23 जुलाई को जारी उन आदेशों को रद्द करने की मांग की थी, जिनके तहत मध्य दिल्ली के कुछ हिस्सों में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं अस्थायी रूप से बंद कर दी गई थीं।

कॉकरोच जनता पार्टी ने 20 जून से जंतर-मंतर पर नीट प्रश्नपत्र लीक मामले में सरकार से जवाबदेही तय करने और तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन शुरू किया था।

एक महीने से अधिक समय तक चले इस आंदोलन को शनिवार को तब समाप्त कर दिया गया, जब धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और सरकार ने कॉजपा की अन्य मांगें भी स्वीकार कर लीं। इसके बाद मध्य दिल्ली में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बहाल कर दी गईं।

याचिका में कहा गया था कि मोबाइल इंटरनेट सहित दूरसंचार सेवाओं का अस्थायी निलंबन कार्यपालिका को प्राप्त सबसे असाधारण दमनकारी शक्तियों में से एक है, क्योंकि इससे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), 19(1)(बी) (शांतिपूर्ण सभा का अधिकार), 19(1)(जी) (व्यवसाय या पेशा करने का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकार प्रभावित होते हैं।

याचिकाकर्ता ने इंटरनेट बंद करने के आदेशों को ‘अवैध, मनमाना और असंवैधानिक’ बताते हुए कहा कि इनमें न तो किसी सार्वजनिक आपातस्थिति का स्पष्ट उल्लेख किया गया और न ही यह बताया गया कि पूरे क्षेत्र में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बंद करना क्यों आवश्यक है।

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि निलंबन आदेशों से यह भी स्पष्ट नहीं होता कि अधिकारियों ने स्वतंत्र रूप से तथ्यों पर विचार किया था। इसके बजाय, यह वैधानिक शक्तियों का यांत्रिक इस्तेमाल प्रतीत होता है, जो प्रशासनिक कानून की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं है।

भाषा शोभना रंजन

रंजन


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