मथुरादासपुरा डंपिंग यार्ड का प्लास्टिक कचरा आसपास की मिट्टी, पानी में बीपीए का जहर घोल रहा : अध्ययन
मथुरादासपुरा डंपिंग यार्ड का प्लास्टिक कचरा आसपास की मिट्टी, पानी में बीपीए का जहर घोल रहा : अध्ययन
(अविनाश बाकोलिया)
जयपुर, सात जून (भाषा) जयपुर के बाहरी क्षेत्र में स्थित मथुरादासपुरा डंपिंग यार्ड के प्लास्टिक कचरे से रिसने वाला दूषित तरल पदार्थ (लीचेट) आसपास की कृषि भूमि और जल स्रोतों में बिस्फेनॉल-ए (बीपीए) नामक हानिकारक रसायन का जहर घोल रहा है, जिससे क्षेत्र में उगाई जाने वाली फसलों को खतरा पैदा हो गया है। अजमेर स्थित राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के हालिया अध्ययन से यह खुलासा हुआ है।
शोधार्थी प्रेक्षा पलसानिया ने पर्यावरण विज्ञान विभाग की सह आचार्य डॉ. गरिमा कौशिक के मार्गदर्शन में मथुरादासपुरा डंपिंग यार्ड और उसके आसपास एक साल की अवधि में बीपीए प्रदूषण का स्तर आंका। इस दौरान डंपिंग यार्ड के दो किलोमीटर दायरे में अलग-अलग जगहों से मिट्टी और पानी के नमूने तीन बार एकत्र किए गए। नमूनों की जांच में चौंकाने वाले परिणाम सामने आए।
पलसानिया ने कहा, “डंपिंग यार्ड के आसपास की मिट्टी में बीपीए की मात्रा 770.8 मिलीग्राम/लीटर, जबकि पानी में इसकी मात्रा 798.9 मिलीग्राम/लीटर तक दर्ज की गई। इससे पता चलता है कि लैंडफिल से निकलने वाले जहरीले रसायन आसपास के स्रोतों को दूषित कर रहे हैं।”
उन्होंने कहा, “मथुरादासपुरा डंपिंग यार्ड आज एक कृत्रिम पहाड़ का रूप ले चुका है। यहां हर दिन बड़ी मात्रा में प्लास्टिक की थैलियां, बोतलें, खाने के डिब्बे और घरेलू कचरा जमा हो रहा है। देखने में यह सिर्फ एक सामान्य कचरा स्थल लगता है, लेकिन इसके भीतर एक गंभीर पर्यावरणीय खतरा धीरे-धीरे आकार ले रहा है।”
पलसानिया ने बताया कि बारिश में डंपिग यार्ड में दबा हुआ प्लास्टिक कचरा विघटित होकर आसपास की मिट्टी और पानी में जहरीले रसायन छोड़ता है। बीपीए इन्हीं जहरीले रसायनों में एक है। यह रसायन आमतौर पर फूड ग्रेड प्लास्टिक, डिस्पोजेबल कंटेनर और पैकिंग सामग्री में इस्तेमाल किया जाता है।”
उन्होंने बताया कि बीपीए मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक हो सकता है, क्योंकि इसके संपर्क में आने पर हार्मोन असंतुलन, प्रजनन संबंधी समस्याओं, बच्चों के विकास पर असर और कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
शोधकर्ता के मुताबिक, बीपीए पौधों की वृद्धि और उपज पर भी बुरा असर डालता है।
उन्होंने बताया, “बीपीए के संपर्क में आने पर चने के पौधों में बीजों का अंकुरण कम हुआ, हरियाली देने वाला क्लोरोफिल घटा और प्रोटीन तथा एंजाइम की मात्रा भी कम हो गई। अधिक मात्रा में बीपीए होने पर पौधों की वृद्धि में 70-80 फीसदी तक कमी देखी गई। इससे स्पष्ट है कि इस रसायन के मिलने से आसपास की मिट्टी खेती के लिए कम उपजाऊ होती जा रही है।”
अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित “वाटर, एयर एंड सॉइल पॉल्युशन” पत्रिका में प्रकाशित किए गए हैं।
शोधकर्ताओं ने पॉलीइथाइलीन टेरेफ्थेलेट (पीईटी) माइक्रोप्लास्टिक के प्रभाव पर भी अध्ययन किया, जो प्लास्टिक बोतलों और पैकिंग सामग्री के धीरे-धीरे टूटने पर बनते हैं।
डॉ. कौशिक ने बताया कि अध्ययन में पाया गया कि माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा बढ़ने पर पौधों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया प्रभावित हुई, जिससे उनका विकास रुक गया, बीज ठीक से अंकुरित नहीं हुए और पत्तियों की संख्या भी कम हो गई।
शोधकर्ताओं ने बताया कि माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क में आने पर पौधों की कोशिकाओं की झिल्ली कमजोर हो गई और उन्होंने खुद को बचाने के लिए अतिरिक्त मात्रा में एस्कॉर्बिक एसिड बनाना शुरू किया, जो तनाव से लड़ने में मदद करता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि अगर कृषि भूमि में लगातार माइक्रोप्लास्टिक जमा होते रहे, तो भविष्य में फसल उत्पादन और खाद्य सुरक्षा पर खतरा बढ़ सकता है। यह अध्ययन “बायोकैटालिसिस एंड एग्रीकल्चरल बायोटेक्नोलॉजी” पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
भाषा
बाकोलिया नेत्रपाल पारुल
पारुल

Facebook


