पश्चिम बंगाल में स्कूलों के मध्याह्न भोजन से अंडे हटने के बाद सियासी बहस शुरू

पश्चिम बंगाल में स्कूलों के मध्याह्न भोजन से अंडे हटने के बाद सियासी बहस शुरू

पश्चिम बंगाल में स्कूलों के मध्याह्न भोजन से अंडे हटने के बाद सियासी बहस शुरू
Modified Date: June 26, 2026 / 05:04 pm IST
Published Date: June 26, 2026 5:04 pm IST

कोलकाता, 26 जून (भाषा) पश्चिम बंगाल के राजनीतिक भविष्य को लेकर लड़ाई भले ही खत्म हो गई हो, लेकिन विधानसभा चुनाव प्रचार के सबसे भावनात्मक मुद्दों में से एक मुद्दा स्कूलों की रसोई में फिर से उठ खड़ा हुआ है।

कोलकाता नगर निगम क्षेत्र के स्कूलों में मध्याह्न भोजन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी इस्कॉन को सौंपने और अंडों की जगह शाकाहारी विकल्प देने के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार के फैसले ने पोषण, संस्कृति और पहचान को लेकर व्यापक बहस को फिर से हवा दे दी है।

इस कदम ने चुनावी मौसम के उस टकराव की यादें ताजा कर दी हैं, जब मछली एक राजनीतिक प्रतीक बन गई थी और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने भाजपा पर पश्चिम बंगाल पर शाकाहारी सांस्कृतिक ढांचा थोपने की कोशिश करने का आरोप लगाया था।

विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत के बाद राज्य का पहला बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री स्वप्न दासगुप्ता ने घोषणा की कि प्राथमिक विद्यालयों में मध्याह्न भोजन के लिए प्रति छात्र सामग्री लागत 6.78 रुपये से बढ़ाकर 10 रुपये की जाएगी। इसके साथ ही, कोलकाता नगर निगम (केएमसी) क्षेत्र में एक पायलट परियोजना के तहत भोजन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी इस्कॉन को सौंपने का फैसला किया गया।

बजट में आवंटन में बढ़ोतरी का विभिन्न राजनीतिक दलों ने स्वागत किया। लेकिन सारा ध्यान एक बदलाव पर चला गया: बंगाल के स्कूल मध्याह्न कार्यक्रम में सबसे लोकप्रिय चीज़ माने जाने वाले अंडे अब खाने की थाली से गायब हो जाएंगे।

छात्रों को पनीर, राजमा, सोया से बनी चीज़ें, दालें और दूध से बनी चीज़ें जैसे प्रोटीन से भरपूर शाकाहारी विकल्प दिए जाएंगे।

इस कदम ने तुरंत राजनीतिक रंग ले लिया है, खासकर ऐसे राज्य में जहां खान-पान की पसंद अक्सर चुनावी मुद्दों से जुड़ी होती है।

विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान तत्कालीन सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने बार-बार भाजपा पर बंगाल की खाद्य संस्कृति को बदलने की कोशिश करने का आरोप लगाया था और मछली खाने को बंगाली पहचान का अभिन्न हिस्सा बताया था।

नेता प्रतिपक्ष और ऋतब्रत बनर्जी ने आरोप लगाया कि यह कदम खान-पान की लंबे समय से चली आ रही पसंद को प्रभावित करने की कोशिश है।

टीएमसी के बागी नेता बनर्जी ने कहा, ‘‘पीढ़ियों से बंगाल के बच्चे अपने नियमित आहार के हिस्से के रूप में पशु-आधारित प्रोटीन का सेवन करते आए हैं। पोषण योजनाओं में स्थानीय खाद्य संस्कृति की झलक होनी चाहिए, न कि उससे दूर जाने का प्रयास किया जाना चाहिए।’’

टीएमसी के राज्यसभा सदस्य डेरेक ओ ब्रायन ने इस फैसले को एक व्यापक वैचारिक एजेंडे से जोड़ते हुए आरोप लगाया कि भाजपा सरकार कल्याणकारी योजना के माध्यम से ‘शाकाहार थोपने’ की कोशिश कर रही है।

भाजपा सरकार ने इन आलोचनाओं को खारिज कर दिया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने विधानसभा में इस फैसले का बचाव करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य बच्चों को गुणवत्तापूर्ण और स्वच्छ भोजन उपलब्ध कराना है।

उन्होंने कहा, ‘‘कोई भी किसी पर अपनी धार्मिक मान्यताएं नहीं थोप रहा है। हमारा ध्यान छात्रों को अच्छा और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने पर है।’’

स्कूल शिक्षा मंत्री दीपक बर्मन ने तर्क दिया कि शाकाहारी आहार पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरी तरह से पूरा करने में सक्षम है। उन्होंने कहा, ‘दुनिया भर में करोड़ों लोग शाकाहारी भोजन पर स्वस्थ जीवन जीते हैं। पोषण का आकलन वैज्ञानिक मानकों के आधार पर किया जाना चाहिए, न कि इस आधार पर कि भोजन में अंडा शामिल है या नहीं।’’

हालांकि, इस फैसले पर सबसे तीखी प्रतिक्रियाएं स्कूलों से ही सामने आई हैं। विभिन्न जिलों के शिक्षकों का कहना है कि जिन दिनों मध्याह्न भोजन में अंडा परोसा जाता है, उन दिनों स्कूलों में उपस्थिति अक्सर बढ़ जाती है, खासकर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों की।

कोलकाता के एक स्कूल के प्रधानाध्यापक ने कहा कि बच्चे अंडा-युक्त भोजन का किसी भी अन्य भोजन की तुलना में अधिक उत्सुकता से इंतजार करते थे।

उन्होंने कहा, ‘‘हम खर्च में बढ़ोतरी और भोजन की गुणवत्ता सुधारने के किसी भी प्रयास का स्वागत करते हैं। लेकिन छात्रों के बीच अंडों का विशेष महत्व है। यह देखना अभी बाकी है कि अंडे के विकल्प बच्चों में उतना ही उत्साह पैदा कर पाते हैं या नहीं।’’

भाषा आशीष संतोष

संतोष


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