गोदाम ढहने की घटना पर सियासी घमासान, फिरहाद हकीम के खिलाफ कार्रवाई की मांग हुई तेज
गोदाम ढहने की घटना पर सियासी घमासान, फिरहाद हकीम के खिलाफ कार्रवाई की मांग हुई तेज
कोलकाता, 26 जून (भाषा) कोलकाता के तारातला में गोदाम ढहने की घटना के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में घमासान शुरू हो गया है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के ममता बनर्जी गुट, वाम दलों, कांग्रेस और राज्य में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कुछ नेताओं ने कोलकाता के पूर्व महापौर फिरहाद हकीम के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
इस हादसे में अब तक 15 लोगों की मौत हो चुकी है।
निर्माणाधीन गोदाम के मलबे में खोज एवं बचाव अभियान से शुरू हुआ यह मामला अब जवाबदेही को लेकर बड़े राजनीतिक विवाद का रूप ले चुका है। ढांचे की स्वीकृति प्रक्रिया को मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी द्वारा सार्वजनिक रूप से हकीम से जोड़ने के बाद वह विवाद के केंद्र में आ गए हैं।
अधिकारियों ने बताया कि शुक्रवार को मलबे से दो और शव बरामद किए जाने तथा दो घायलों की इलाज के दौरान मौत हो जाने के बाद मृतकों की संख्या बढ़कर 15 हो गई है।
राजनीतिक विवाद तब और बढ़ गया जब अधिकारी ने विधानसभा में कहा कि गोदाम की योजना को अंतिम मंजूरी हकीम के महापौर और नगर भवन विभाग के प्रमुख रहने के दौरान मिली थी।
मुख्यमंत्री द्वारा उद्धृत सरकारी अभिलेखों के अनुसार, भवन प्रस्ताव को पिछले वर्ष 20 नवंबर को नगर भवन समिति की बैठक में मंजूरी दी गई थी। बैठक के कार्यवृत्त में उल्लेख है कि अंतिम स्वीकृति के लिए महापौर या भवन विभाग के प्रभारी महापौर-परिषद सदस्य की मंजूरी आवश्यक थी।
उस समय दोनों पदों पर रहे हकीम ने स्वीकृति संबंधी दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे। पूर्व महापौर ने किसी भी प्रकार की अनियमितता के आरोपों को खारिज किया है।
उन्होंने संवाददाताओं से कहा, ‘‘जहां तक मेरी जानकारी है, गोदाम अवैध नहीं था। निगरानी में कोई चूक हुई हो सकती है। कोई महापौर या आयुक्त हर निर्माण स्थल की व्यक्तिगत रूप से निगरानी नहीं कर सकता। मैं तकनीकी विशेषज्ञ नहीं हूं। ऐसी फाइल पर मेरे हस्ताक्षर प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं।’’
हालांकि, उनके इस स्पष्टीकरण से राजनीतिक विवाद शांत नहीं हुआ।
ममता बनर्जी के प्रति निष्ठा रखने वाले नेताओं ने सवाल उठाया है कि हकीम को वही जांच का सामना क्यों नहीं करना पड़ रहा, जिसका सामना अन्य विपक्षी नेताओं को करना पड़ा है।
तृणमूल कांग्रेस विधायक कुणाल घोष ने पूर्व महापौर से हिरासत में पूछताछ की मांग की, जबकि पार्टी सांसद महुआ मोइत्रा ने सवाल किया कि यदि अन्य मामलों के आरोपी कई सप्ताह जेल में रहे हैं तो हकीम अब तक खुले में क्यों घूम रहे हैं।
ममता खेमे के एक वरिष्ठ नेता ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘मुख्यमंत्री भी आधिकारिक अभिलेखों और हस्ताक्षरों का उल्लेख कर चुके हैं। जांच बिना किसी पक्षपात या भय के आगे बढ़नी चाहिए।’’
इस मुद्दे ने वाम दलों और कांग्रेस को भी सरकार पर हमला करने का अवसर दिया है। दोनों दलों ने भाजपा सरकार पर चुनिंदा कार्रवाई करने का आरोप लगाया है।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) नेता सुजान चक्रवर्ती ने आरोप लगाया कि कोलकाता में निर्माण संबंधी बार-बार होने वाली दुर्घटनाओं ने नेताओं और बिल्डरों के गठजोड़ को उजागर कर दिया है। उन्होंने सवाल किया कि क्या राजनीतिक कारणों से जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा रही है।
दिलचस्प बात यह है कि दबाव भाजपा के कुछ वर्गों से भी आ रहा है।
मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने कहा कि स्वीकृति प्रक्रिया से जुड़े लोग जांच से बच नहीं सकते। उन्होंने कहा, ‘‘यदि अधिकारियों से पूछताछ हो रही है, तो उस समय मंत्री और निर्णय लेने वाले पदों पर रहे लोगों की भी जांच होनी चाहिए। किसी को भी नहीं बख्शा जाना चाहिए।’’
इस विवाद ने ममता बनर्जी खेमे और विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस के बागी गुट के बीच जारी खींचतान में एक नया मोर्चा खोल दिया है। कोलकाता पोर्ट विधानसभा क्षेत्र से विधायक हकीम, ऋतब्रत बनर्जी खेमे के करीबी माने जाते हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री के करीबी नेताओं का आरोप है कि हकीम के खिलाफ कार्रवाई में किसी भी प्रकार की हिचकिचाहट से भाजपा और बागी गुट के प्रभावशाली नेताओं के बीच अंदरूनी समझ की धारणा मजबूत हो सकती है। वे मुख्यमंत्री के विधानसभा भाषण का हवाला देते हैं, जिसमें उन्होंने पहले हकीम की भूमिका का उल्लेख किया और बाद में उनके तत्कालीन विशेष कार्याधिकारी (ओएसडी) कालीचरण बंदोपाध्याय की ओर ध्यान केंद्रित किया।
बागी गुट ने इन आरोपों को त्रासदी का राजनीतिकरण करने का प्रयास बताया है।
ऋतब्रत बनर्जी के करीबी एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि ध्यान हादसे की जिम्मेदारी तय करने पर होना चाहिए, न कि गुटीय राजनीति पर।
उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘15 लोगों की जान गई है। यह राजनीतिक साजिश संबंधी सिद्धांतों पर चर्चा का समय नहीं है। यदि कोई अनियमितता हुई है तो कानून को अपना काम करना चाहिए, चाहे संबंधित व्यक्ति भाजपा, पुराने तृणमूल नेतृत्व या बागी गुट से जुड़ा हो।’’
बागी गुट के एक विधायक ने कहा कि यह त्रासदी ऐसी व्यवस्थागत विफलताओं को उजागर करती है जो किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘सारी जिम्मेदारी एक हस्ताक्षर तक सीमित करने का प्रयास इस तथ्य की अनदेखी करता है कि भवन स्वीकृति, निरीक्षण और अनुपालन की पूरी प्रक्रिया कैसे काम करती है। जांच में सभी जिम्मेदार लोगों की पहचान होनी चाहिए।’’
हालांकि, इस मामले के राजनीतिक प्रभाव तत्काल जांच से कहीं आगे तक जाते हैं।
हकीम पुराने तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व के सबसे प्रमुख मुस्लिम चेहरों में से एक हैं और कोलकाता की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं। उनके खिलाफ किसी भी कार्रवाई का असर पहले से बिखरे हुए विपक्षी परिदृश्य पर पड़ सकता है, जहां पार्टी की चुनावी हार के बाद कई पूर्व तृणमूल विधायक और नेता ऋतब्रत खेमे में शामिल हो चुके हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह मामला केवल प्रशासनिक जवाबदेही की ही नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री द्वारा सार्वजनिक रूप से नाम लिए गए नेता के खिलाफ कार्रवाई करने की भाजपा सरकार की इच्छाशक्ति की भी परीक्षा बन गया है।
ममता खेमे के लिए यह मुद्दा बागी गुट की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने और राजनीतिक संरक्षण के आरोपों को फिर से उभारने का अवसर है। वहीं, बागी गुट के लिए यह खुद को गुटीय प्रतिशोध के बजाय विधिसम्मत प्रक्रिया के समर्थक के रूप में प्रस्तुत करने का मौका है।
भाषा अमित आशीष
आशीष

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