न्यायिक समीक्षा की शक्ति एक संवैधानिक कर्तव्य, जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकते: न्यायालय
न्यायिक समीक्षा की शक्ति एक संवैधानिक कर्तव्य, जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकते: न्यायालय
नयी दिल्ली, 14 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि न्यायिक समीक्षा की शक्ति एक संवैधानिक कर्तव्य है और वह सामाजिक सुधार तथा कल्याण के मामलों में अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह टिप्पणी केरल के शबरिमला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और दाऊदी बोहरा सहित कई धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान की।
इस संविधान पीठ में न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले, न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।
इस मामले में न्याय मित्र नियुक्त किये गए वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने कहा कि सामाजिक कल्याण और सुधार की प्राथमिक जिम्मेदारी विधायिका की है, जो एक संवैधानिक दायित्व है, लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीं है कि कुछ परिस्थितियों में न्यायालय को अधिकार प्राप्त नहीं है।
परमेश्वर ने दलील दी कि न्यायिक भूमिका किसी अति उत्साही सुधारक या मूकदर्शक की नहीं है।
न्यायमित्र की दलील से सहमति जताते हुए प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, ‘‘आप बिलकुल सही हैं कि संवैधानिक न्यायालय अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता, हम इसे त्याग नहीं सकते। यह शक्ति का प्रश्न नहीं है। यह संवैधानिक न्यायालय का संवैधानिक कर्तव्य है।’’
परमेश्वर ने दलील दी कि धार्मिक अधिकारों की वैधता का आकलन तर्कसंगतता जैसे कारकों के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए।
न्यायमित्र ने कहा, ‘‘आस्था और तर्क में बहुत बड़ा अंतर है। जैसे ही आप तर्क को बीच में लाते हैं, संविधान के अनुच्छेद 25 और 26, सभी सम्मान के साथ, संविधान से बाहर हो जाते हैं।’’ उन्होंने कहा कि यदि लोगों की स्वतंत्रता या गरिमा को बनाए रखने के लिए ऐसा हस्तक्षेप आवश्यक हो तो न्यायालय धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप कर सकते हैं।
परमेश्वर ने शीर्ष अदालत से धार्मिक संप्रदाय शब्द को व्यापक अर्थ देने का अनुरोध करते हुए कहा, ‘‘हमें एक आयरिश शब्द विरासत में मिला है, इसे भारतीय अर्थ देना आप पर निर्भर है।’’
सुनवाई की शुरुआत में हस्तक्षेपकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि सैयदना फैसले को चुनौती देने वाली 1986 की रिट याचिका मूल याचिकाकर्ताओं के निधन और इसे आगे बढ़ाने के लिए एक पंजीकृत निकाय के अभाव के कारण प्रभावी रूप से समाप्त हो गई है।
रोहतगी ने अदालत को बताया कि 75 वर्षों में बहिष्कार का कोई मामला सामने नहीं आया है और उन्होंने निरंकुश सत्ता के विचार को खारिज कर दिया।
उच्चतम न्यायालय ने मामले में पक्षकारों की दलीलें 16 दिनों तक सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया और उन्हें 29 मई तक विस्तृत लिखित दलीलें दाखिल करने को कहा।
सितंबर 2018 में, पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के शबरिमला स्थित अय्यप्पा मंदिर में प्रवेश पर लगी रोक को हटा दिया था और इस सदियों पुरानी धार्मिक प्रथा को अवैध और असंवैधानिक करार दिया था।
बाद में, 14 नवंबर, 2019 को, तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की एक अन्य पीठ ने 3:2 के बहुमत से, विभिन्न पूजा स्थलों पर महिलाओं से भेदभाव के मुद्दे को विस्तृत सुनवाई के लिए बड़ी पीठ के पास भेज दिया।
पीठ ने तब धर्मों में स्वतंत्रता से संबंधित व्यापक मुद्दों को परिभाषित करते हुए कहा था कि विशिष्ट मामले के तथ्यों के बिना इन मुद्दों पर निर्णय नहीं लिया जा सकता है।
शबरिमला मामले के अलावा, पीठ के पास मुस्लिम महिलाओं के मस्जिदों और दरगाहों में प्रवेश और गैर-पारसी पुरुषों से विवाहित पारसी महिलाओं के अगियारी के पवित्र अग्नि स्थल में प्रवेश के मुद्दों को भी विचार के लिए भेजा गया था।
उच्चतम न्यायालय की एक अन्य पीठ ने 11 मई, 2020 को माना कि शबरिमला मंदिर प्रवेश मामले में समीक्षा क्षेत्राधिकार के तहत अपनी सीमित शक्ति का प्रयोग करते हुए, उसकी पांच-न्यायाधीशों की पीठ के पास विधि के प्रश्नों को निर्णय के लिए एक बड़ी पीठ को संदर्भित करने की शक्ति थी।
उच्चतम न्यायालय ने 16 फरवरी को कहा था कि वह इस मामले की अंतिम सुनवाई सात अप्रैल से शुरू करेगा, जिसके 22 अप्रैल को समाप्त होने की उम्मीद थी।
केंद्र सरकार का पक्ष रखने के लिए पेश हुए सॉलिसिटर जनरल मेहता ने कहा था कि वह शबरिमला फैसले की समीक्षा की याचिकाओं का समर्थन करते हैं, जिसने केरल में पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी।
इससे पहले, उच्चतम न्यायालय ने धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे को लेकर सात प्रश्न तैयार किये जिनपर सुनवाई की जानी थी।
पीठ ने निर्धारित मुद्दों को जोड़ने और हटाने का अधिकार होने का हवाला देते हुए कहा कि वह इस बात पर विचार करेगी कि ‘‘भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का दायरा और सीमा क्या है?’’
पीठ ने सुनवाई के लिए दूसरा मुद्दा यह तय किया, ‘‘ भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत व्यक्तियों के अधिकारों और अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों के बीच क्या परस्पर संबंध है?’’
तीसरा प्रश्न यह है कि क्या अनुच्छेद 26 के तहत किसी धार्मिक संप्रदाय के अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अलावा अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन हैं।
चौथा प्रश्न यह तय किया गया कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के अंतर्गत ‘नैतिकता’ शब्द का दायरा और विस्तार क्या है, और क्या इसमें संवैधानिक नैतिकता शामिल है?
पीठ ने कहा था कि पांचवे सवाल के तहत वह अनुच्छेद 25 के तहत संदर्भित धार्मिक प्रथा के संबंध में ‘‘न्यायिक समीक्षा के दायरे और सीमा’’ पर भी विचार करेगी।
छठा सवाल यह तय किया गया कि ‘‘भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 (2) (ख) में प्रयुक्त ‘‘हिंदुओं के वर्ग’’ की अभिव्यक्ति का क्या अर्थ है?’’
न्यायालय ने कहा था कि वह सातवें प्रश्न के रूप में इस बात की जांच करेगा कि क्या कोई व्यक्ति जो किसी धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह से संबंधित नहीं है, जनहित याचिका दायर करके उस ‘‘धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह’’ की किसी प्रथा पर सवाल उठा सकता है?
इसमें कहा गया था कि बड़ी पीठ को धार्मिक स्वतंत्रता के मामलों में ‘‘पर्याप्त और पूर्ण न्याय’’ करने के लिए एक न्यायिक नीति विकसित करनी होगी।
भाषा धीरज नरेश
नरेश

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