प्रियदर्शनी मट्टू मामला: न्यायालय ने दोषी की याचिका पर सुनवाई से इनकार किया
प्रियदर्शनी मट्टू मामला: न्यायालय ने दोषी की याचिका पर सुनवाई से इनकार किया
नयी दिल्ली, 10 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को 1996 के प्रियदर्शनी मट्टू हत्याकांड में दोषी संतोष कुमार सिंह को दी गई पैरोल की अवधि न बढ़ाए जाने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया।
न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा कि छूट से संबंधित मुख्य मामला पहले से ही दिल्ली उच्च न्यायालय में लंबित है और 18 मई को इसकी सुनवाई होनी है।
पीठ ने सिंह को उच्च न्यायालय के समक्ष अपनी याचिका पर सुनवाई में तेजी लाने और मामले में शीघ्र निपटारे का अनुरोध करने की अनुमति दे दी।
इसने कहा, ‘‘यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि यदि ऐसा कोई अनुरोध किया जाता है, तो उच्च न्यायालय मामले के तथ्यों को ध्यान में रखते हुए इस पर विचार करेगा, क्योंकि घटना 23 जनवरी, 1996 को हुई थी और याचिकाकर्ता 31 वर्षों से जेल में है जिसमें छूट शामिल है।’’
शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय से कहा कि वह मामले का निपटारा कानून के अनुसार जल्द से जल्द करे।
सिंह के वकील ने दलील दी कि उच्च न्यायालय ने आत्मसमर्पण करने का निर्देश देते हुए एक बहुत ही कठोर आदेश पारित किया है और उनका मुवक्किल ‘खुली जेल’ में अपनी सजा काट रहा है, जिसके तहत उसे लाभकारी रोजगार के लिए प्रतिदिन सुबह 8 बजे से रात 8 बजे के बीच जेल परिसर से बाहर निकलने की अनुमति होती है।
उच्च न्यायालय ने 19 मार्च को सिंह को तब आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया, जब मट्टू के भाई ने उसकी समय पूर्व रिहाई याचिका का कड़ा विरोध किया था।
इसने कहा था कि अदालत सिंह की सजा में छूट की याचिका पर तभी विचार करेगी जब वह आत्मसमर्पण कर देगा।
मट्टू के भाई ने दलील दी कि सजा समीक्षा बोर्ड (एसआरबी) ने सिंह की सजा में छूट की याचिका को खारिज कर सही किया है।
सिंह को पिछले साल पैरोल दी गई थी। वह सजा में छूट संबंधी अपनी याचिका लंबित रहने के दौरान उच्च न्यायालय से कई बार पैरोल अवधि बढ़वाने में सफल रहने के बाद से जेल से बाहर ही रहा है।
जनवरी 1996 में 25 वर्षीय मट्टू के साथ बलात्कार किया गया था और उसकी हत्या कर दी गई थी। घटना के समय दिल्ली विश्वविद्यालय में कानून के छात्र रहे सिंह को 3 दिसंबर 1999 को एक निचली अदालत ने बरी कर दिया था। हालांकि, उच्च न्यायालय ने 27 अक्टूबर 2006 को इस फैसले को पलट दिया और पूर्व आईपीएस अधिकारी के बेटे सिंह को दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई।
शीर्ष अदालत ने अक्टूबर 2010 में दोषसिद्धि को बरकरार रखा लेकिन मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया।
पिछले साल जुलाई में, उच्च न्यायालय ने दोषी की समय पूर्व रिहाई से इनकार करने वाले एसआरबी के फैसले को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि उसके सुधारात्मक आचरण पर विचार नहीं किया गया।
यह उल्लेख करते हुए कि सिंह में सुधार के कुछ लक्षण दिखाई दिए हैं, उच्च न्यायालय ने मामले को एसआरबी को वापस भेज दिया ताकि वह उसकी समय पूर्व रिहाई याचिका पर नए सिरे से विचार कर सके।
इसने था, ‘‘याचिकाकर्ता (सिंह) की स्पष्ट रूप से प्रदर्शित सुधारात्मक प्रगति का मूल्यांकन करने का कोई प्रयास नहीं किया गया, जिसमें उन्नत शैक्षणिक योग्यताएं, दस्तावेजी रूप से प्रमाणित अच्छा आचरण और पुनर्वास कार्यक्रमों में भागीदारी शामिल है।’’
अदालत ने उल्लेख किया था कि सिंह फिलहाल एक खुली जेल में बंद है।
उसने कहा था कि इस प्रकार की जेल श्रेणी में रखा जाना दोषी के ‘‘सकारात्मक सुधारात्मक आचरण’’ का प्रतिबिंब है और यह सुधार का एक महत्वपूर्ण संकेतक था जिसे एसआरबी स्वीकार करने में भी विफल रहा, मूल्यांकन करना तो दूर की बात है।
अदालत ने कहा कि सिंह की समय पूर्व रिहाई की याचिका को खारिज करने का एसआरबी का निर्णय उचित नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि अस्वीकृति आदेश में न तो विचार-विमर्श का कोई सार्थक तरीका झलकता है और न ही उसके द्वारा किए गए सुधारात्मक प्रयासों का कोई तर्कसंगत विश्लेषण प्रतिबिंबित होता है।
इसने कहा था कि छूट सहित 20 साल कैद की सजा काटने के बाद सिंह समय पूर्व रिहाई का पात्र है।
वर्ष 2024 में एसआरबी की बैठकों में, बोर्ड ने सही ढंग से स्वीकार किया कि 2004 की नीति लागू है, क्योंकि यह उसकी दोषसिद्धि की तारीख को लागू थी।
सिंह ने 2023 में उच्च न्यायालय में दायर अपनी याचिका में, 21 अक्टूबर, 2021 की बैठक में समय पूर्व रिहाई की उसकी याचिका को अस्वीकार करने वाली एसआरबी की सिफारिश को रद्द करने का अनुरोध किया था। इसके बाद, 2024 की बैठक में उसके मामले पर विचार किया गया और इसे फिर से खारिज कर दिया गया।
भाषा
नेत्रपाल वैभव
वैभव

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