पर्यटकों को लुभा रहा राजस्थान का संगमरमर अपशिष्ट निपटान क्षेत्र, विशेषज्ञों ने चेताया
पर्यटकों को लुभा रहा राजस्थान का संगमरमर अपशिष्ट निपटान क्षेत्र, विशेषज्ञों ने चेताया
(तस्वीरों के साथ)
(गुंजन शर्मा)
किशनगढ़ (राजस्थान), 29 मार्च (भाषा) सूरज की तेज रोशनी में अंतहीन सफेद मैदान, न चीड़ के पेड़, न ही हवा में ठंडक, फिर भी यह नजारा किसी पोस्टकार्ड जैसा लगता है। कई लोग बोलीविया के नमक के मैदानों, बर्फ से ढके गुलमर्ग या यहां तक कि खूबसूरत स्विट्जरलैंड जैसी कल्पना लिए इस दृश्य का दीदार करने आ रहे हैं।
यह मनोरम स्थान फिल्मों के लिए भी एक लोकप्रिय गंतव्य बन गया है। लेकिन यह बर्फ जैसा दिखने वाला मैदान वास्तव में शुष्क राजस्थान में अजमेर जिले के किशनगढ़ स्थित एशिया का सबसे बड़ा संगमरमर अपशिष्ट निस्तारण स्थल है।
इस अपशिष्ट निस्तारण स्थल पर रोजाना लगभग 22 लाख लीटर संगमरमर के घोल से भरे 700 से अधिक टैंकर खाली किए जाते हैं। इस स्थान पर रोजाना कम से कम 5,000 पर्यटक आते हैं, जबकि सप्ताहांत और छुट्टियों के दौरान यह संख्या 20,000 तक पहुंच जाती है।
अपने सफेद रंग के कारण, 350 एकड़ में फैला यह संगमरर अपशिष्ट निस्तारण स्थल प्री-वेडिंग और व्यावसायिक शूट के लिए एक लोकप्रिय स्थान बन गया है। हालांकि, पर्यावरणविदों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इसे न केवल स्वास्थ्य के लिए खतरा बल्कि प्रदूषण का केंद्र भी बताया है।
राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय द्वारा किए गए अध्ययनों में इसे ‘‘विषाक्त पर्यटन स्थल’’ के रूप में चिह्नित किया गया है। इन अध्ययनों में अनियंत्रित रूप से कचरा निस्तारण के स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी प्रभावों का दस्तावेजीकरण किया गया है। ये चिंताएं राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) तक भी पहुंचीं, जिसने राज्य और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्यों सहित एक संयुक्त समिति का गठन किया।
राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय में पर्यावरण विज्ञान के प्रोफेसर लक्ष्मीकांत शर्मा ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘इसके विशाल आकार और व्यापक प्रभाव के बावजूद, इस कचरा निस्तारण स्थल को बुनियादी पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों का घोर उल्लंघन करते हुए संचालित किया जा रहा है। यहां न तो कोई सुनियोजित लाइनर प्रणाली (भूजल को प्रदूषित होने से रोकने के लिए बनाई जाने वाली संरचना) है, न ही अपशिष्ट निथारने वाले कुएं, न ही धूल नियंत्रण तंत्र, न ही वायु या भूजल की निगरानी और न ही कोई सुरक्षात्मक हरित पट्टी।’’
उन्होंने कहा, ‘‘इन विफलताओं के कारण भूजल का गंभीर प्रदूषण, कृषि भूमि का क्षरण और धूल प्रदूषण का उच्च स्तर उत्पन्न हुआ है, जिससे जनस्वास्थ्य खतरे में पड़ गया है।’’
शर्मा ने बताया कि विश्वविद्यालय के अध्ययनों में खुलासा हुआ है कि आसपास के जल स्रोतों में विषाक्तता कचरा निस्तारण स्थल छह किलोमीटर के दायरे में कुल घुलित ठोस पदार्थों की सुरक्षित सीमा से 10 गुना अधिक तक है।
उन्होंने कहा, ‘‘मिट्टी में लेड सिलिकेट की सांद्रता और पानी में नाइट्रेट एवं फ्लोराइड की सांद्रता सामान्य स्तर से कई गुना अधिक पाई गई, जो अत्यधिक प्रदूषण का संकेत है। हमारे अध्ययन में यह भी सामने आया कि पीएम2.5 की सांद्रता परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों की सीमा से अधिक है।’’
शर्मा ने कहा, ‘‘चूंकि कचरे के कण 75 माइक्रोमीटर से भी छोटे हैं, इसलिए वे दूर-दूर तक फैल सकते हैं, जिससे मिट्टी बंजर हो जाती है। कई लोग सिलिकोसिस से पीड़ित हो सकते हैं। सरकार को स्थिति को बेकाबू होने से रोकने के लिए तत्काल कार्रवाई करने की आवश्यकता है।’’
किशनगढ़ संगमरमर उद्योग की स्थापना 1980 के दशक में हुई थी। लगभग 30 वर्ष पूर्व, राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास एवं निवेश निगम (आरआईआईसीओ) ने किशनगढ़ संगमरमर संघ (केएमए) को कचरा निस्तारण के लिए दो स्थान आवंटित किए थे और तभी पहली बार संगमरमर का अपशिष्ट यहां डाला गया था और घोल इतना जमा हो गया कि उससे सफेद पठार और पहाड़ बन गए।
वर्तमान में शहर में संगमरमर कटाई की 1,200 से अधिक इकाइयां हैं।
कई साल तक किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। यह जगह तब सुर्खियों में आई जब हास्य कलाकार कपिल शर्मा ने 2016 में अपनी पहली फिल्म ‘किस किसको प्यार करूं’ के लिए यहां एक गाने की शूटिंग की।
इसके बाद कई और मशहूर हस्तियों ने यहां शूटिंग की। नोरा फतेही ने अपने गाने ‘छोड़ देंगे’ की शूटिंग यहीं की, हनी सिंह और नुसरत भरूचा ‘सैयां जी’ के म्यूजिक वीडियो के लिए आए, और टाइगर श्रॉफ एवं श्रद्धा कपूर ने ‘बागी 3’ के लिए ‘दस बहाने’ गाने की शूटिंग की।
यह जगह प्री-वेडिंग फोटोग्राफरों का भी ध्यान आकर्षित कर रही है, जो सफेद परिदृश्य और नीले तालाबों के बीच जोड़ों की तस्वीरें लेने के लिए उन्हें यहां ला रहे हैं।
केएमए ने इस संगमरमर अपशिष्ट निस्तारण स्थल को पर्यटन स्थल में बदलने का एक अभिनव मॉडल तैयार किया है, जिसमें अब एक हेलीपैड भी है।
पर्यटकों के लिए प्रवेश निःशुल्क है, लेकिन उन्हें लगभग एक किलोमीटर दूर स्थित केएमए कार्यालय से पास प्राप्त करना आवश्यक है। डिजिटल कैमरा लेकर आने वाले आगंतुक को 500 रुपये का भुगतान करना होता है जबकि प्री-वेडिंग शूट का शुल्क 5,100 रुपये प्रति दिन है और व्यावसायिक शूट का शुल्क 21,000 रुपये प्रति दिन तक हो सकता है।
केएमए अध्यक्ष सुधीर जैन ने कहा, ‘‘इससे होने वाली आय का उपयोग संगमरमर अपशिष्ट निस्तारण स्थल के रखरखाव के लिए किया जाता है। हमने शूटिंग के वास्ते आने वालों के लिए चेंजिंग रूम बनाए हैं। यहां एक हेलीपैड भी है। रेस्तरां और मनोरंजन गतिविधियों के कई विकल्प मौजूद हैं। डंपिंग यार्ड ने किशनगढ़ को राष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर ला खड़ा किया है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘हमें किसी भी पर्यटक से स्वास्थ्य संबंधी कोई शिकायत नहीं मिली है। दरअसल, एनजीटी को भी यहां कुछ भी खतरनाक नहीं मिला। हमें इस क्षेत्र के रखरखाव के लिए कुछ दिशानिर्देश जारी किए गए हैं और हम उनका पालन करेंगे।’’
‘पीटीआई-भाषा’ की संवाददाता जब मौके पर पहुंचीं तो उन्हें वहां एक भी व्यक्ति मास्क पहने हुए नहीं मिला, लेकिन अभिभावकों के साथ आए कई बच्चे अपनी आंखें मलते हुए जरूर नजर आए।
इस संगमरमर अपशिष्ट निस्तारण स्थल आने वाले पर्यटकों के लिए सबकुछ मौजूद है जैसे घोड़े, जीप, धूप के चश्मे और फोटो संबंधी अन्य चीजों के स्टॉल। इन गतिविधियों का संचालन करने वाले लोग अपने चेहरे तौलिये से और आंखों को धूप के चश्मे से ढके हुए नजर आए।
संगमरमर अपशिष्ट निस्तारण स्थल के किनारे चौपाटी थीम वाले कई रेस्तरां हैं जहां पर्यटक संगमरमर की महीन धूल उड़ाती हवा के बीच स्वादिष्ट व्यंजनों का आनंद लेते हैं। इस जगह पर बच्चों के लिए एक विशेष क्षेत्र भी है जिसमें कई झूले और गतिविधियां उपलब्ध हैं ताकि बच्चे आंनद ले सकें।
संगमरमर के कण युक्त घोल वाले टैंकर हर 10 मिनट में आकर कचरा बहाते देखे जा सकते हैं, लेकिन इससे पर्यटकों को कोई खास फर्क नहीं पड़ता जो इसके बावजूद यहां ‘सेल्फी’ लेते दिखते हैं।
अहमदाबाद से परिवार के साथ यहां घूमने आए अशोक पुरी ने कहा, ‘‘हमने ऑनलाइन कई वीडियो देखे जिनमें लोग इस जगह को मिनी स्विट्जरलैंड कह रहे थे। इसलिए, जब हम राजस्थान की यात्रा पर आ रहे थे, तो हमने यहां आने का भी कार्यक्रम तैयार किया। यह जगह बेहद खूबसूरत और मनमोहक है।’’
टोकरा, भोजियावास, रहीमपुरा, फलोदा, मोहनपुरा और काली डूंगरी सहित आसपास के गांवों के किसान बताते हैं कि संगमरमर की धूल अक्सर उनकी कृषि भूमि पर जम जाती है और सिंचाई के पानी में मिल जाती है, जिससे फसल उत्पादन प्रभावित होता है।
चाय की दुकान करने वाले मंदराज ने कहा, ‘‘हमारी फसलों पर अक्सर संगमरमर की धूल की एक सफेद परत जम जाती है। अंततः, पैदावार कम होती है। चूंकि मेरे खेत संगमरमर अपशिष्ट निस्तारण स्थल के बहुत करीब हैं, इसलिए पिछले साल कीचड़ बहकर मेरे खेत में जमा हो गया और उस पर एक मोटी परत बन गई, जिससे वह बुवाई के लिए अनुपयुक्त हो गया।’’
किशनगढ़ के विधायक विकास चौधरी ने हालांकि कहा कि केएमए द्वारा कचरा निस्तारण स्थल का रखरखाव अच्छी तरह से किया जाता है और यह देश भर से पर्यटकों को आकर्षित करता है।
उन्होंने कहा, ‘‘उद्योग में इस्तेमाल हो रही मशीनरी से अब कम कचरा निकलता है। संगमरमर संघ अपशिष्ट निस्तारण स्थल के रखरखाव में बहुत अच्छा काम कर रहा है और किशनगढ़ एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल के रूप में उभर रहा है। हालांकि, अगर प्रदूषण या स्वास्थ्य संबंधी कोई चिंता है, तो हम उसका समाधान करने के लिए तैयार हैं।’’
भाषा धीरज नेत्रपाल
नेत्रपाल

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