जन्मजात डायाफ्रामेटिक हर्निया का दुर्लभ मामला: 11 वर्षीय बच्चे का एसएमएस अस्पताल में सफल ऑपरेशन

जन्मजात डायाफ्रामेटिक हर्निया का दुर्लभ मामला: 11 वर्षीय बच्चे का एसएमएस अस्पताल में सफल ऑपरेशन

जन्मजात डायाफ्रामेटिक हर्निया का दुर्लभ मामला: 11 वर्षीय बच्चे का एसएमएस अस्पताल में सफल ऑपरेशन
Modified Date: March 8, 2026 / 12:27 pm IST
Published Date: March 8, 2026 12:27 pm IST

जयपुर, आठ मार्च (भाषा) सवाई मानसिंह अस्पताल (एसएमएस) के शल्य चिकित्सा विभाग ने जन्मजात डायाफ्रामेटिक हर्निया से जूझ रहे 11 साल के बच्चे का जटिल ऑपरेशन कर उसे नया जीवनदान दिया। अस्पताल के चिकित्सकों ने रविवार को यह जानकारी दी।

चिकित्सकों ने बताया कि बच्चा लगभग दो महीनों से सांस लेने में तकलीफ और सीने में दर्द से परेशान था। उन्होंने बताया कि चलने-फिरने या तेज दौड़ने पर उसकी सांस फूलने लगती थी और सीने में दर्द बढ़ जाता था। इसके कारण उसका खेलना बंद हो गया था और पढ़ाई भी प्रभावित होने लगी थी।

अस्पताल के सामान्य शल्य विभाग के सीनियर प्रोफेसर डॉ. जीवन कांकरिया ने बताया कि दो सप्ताह पहले बच्चे की आवश्यक सभी प्रकार की जांच की गई और रिपोर्ट के अध्ययन में यह पाया गया कि बच्चे को जन्म से ही डायाफ्रामेटिक हर्निया की समस्या थी।

उन्होंने बताया कि इस स्थिति में पेट और सीने को अलग करने वाली झिल्ली (डायाफ्राम) में छेद होने के कारण लिवर का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा, पित्ताशय की थैली तथा आंतों का बड़ा भाग सीने के दाहिने हिस्से में चला गया था। इस कारण दाहिना फेफड़ा लगभग सिकुड़ गया था, जिससे बच्चा सांस नहीं ले पा रहा था। अब तक वह लगभग एक ही फेफड़े के सहारे जीवन व्यतीत कर रहा था।

डॉ. कांकरिया ने बताया कि डायाफ्रामेटिक हर्निया एक दुर्लभ जन्मजात बीमारी है। सामान्यतः यह समस्या शरीर के बाईं तरफ पाई जाती है, जबकि दाईं तरफ होने वाले मामलों का प्रतिशत बहुत कम होता है। इसलिए यह मामला चिकित्सकीय दृष्टि से और भी चुनौतीपूर्ण था। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए ऑपरेशन करने का निर्णय लिया गया।

उन्होंने बताया कि परंपरागत रूप से ऐसे मामलों में पेट और सीने दोनों को खोलकर या पीठ की तरफ बड़ा चीरा लगाकर ऑपरेशन किया जाता है। इस मामले में ऑपरेशन लेप्रोस्कोपिक तकनीक से करने का निर्णय लिया गया, जो चुनौतीपूर्ण था।

डॉ. कांकरिया ने बताया कि ऑपरेशन के दौरान सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि लिवर का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा, पित्ताशय की थैली तथा आंत का बड़ा भाग सीने में चला गया था।

इन सभी अंगों को लेप्रोस्कोपिक की सहायता से सीने से निकालकर वापस पेट में स्थापित करना अत्यंत कठिन प्रक्रिया होती है। विशेष रूप से लिवर की सतह बहुत फिसलनभरी होने के कारण उसे सुरक्षित तरीके से वापस पेट में स्थापित करना सबसे बड़ी चुनौती रही। बच्चे के लिवर को सफलतापूर्वक वापस पेट में स्थापित किया गया, हालांकि लंबे समय तक सीने में रहने के कारण बच्चे का लिवर लगभग तीन गुना तक बढ़ गया था। ऑपरेशन के सात दिन बाद बच्चा पूरी तरह स्वस्थ है।

अब उसे न तो सांस लेने में कोई तकलीफ है और न ही सीने में दर्द। वह सामान्य रूप से चल-फिर रहा है और जल्द अपनी रोजमर्रा की गतिविधियों में लौट सकेगा, साथ ही पढ़ाई कर सकेगा तथा खेलकूद में हिस्सा ले सकेगा।

विभागाध्यक्ष डॉ. रिचा जैन ने बताया कि ऑपरेशन टीम में डॉ. गरिमा, डॉ. अनिल, डॉ. बुगालिया तथा डॉ. मेकला का महत्वपूर्ण योगदान रहा। एनेस्थीसिया विभाग के डॉ. सुशील भाटी, डॉ. सुनील चौहान, डॉ. इंदु तथा डॉ. मनोज सोनी का विशेष सहयोग रहा।

भाषा बाकोलिया सिम्मी सुरभि

सुरभि


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