सज्जन कुमार के बरी होने पर 84 के दंगे के पीड़त ने कहा: मेरे पिता को जिंदा जला दिया गया

सज्जन कुमार के बरी होने पर 84 के दंगे के पीड़त ने कहा: मेरे पिता को जिंदा जला दिया गया

सज्जन कुमार के बरी होने पर 84 के दंगे के पीड़त ने कहा: मेरे पिता को जिंदा जला दिया गया
Modified Date: January 22, 2026 / 03:50 pm IST
Published Date: January 22, 2026 3:50 pm IST

नयी दिल्ली, 22 जनवरी (भाषा) वर्ष 1984 के सिख विरोधी दंगों में अपने पिता को आग में जलते हुए देखने वाली एक बेटी, जवानी के दिनों में अपना सुहाग उजड़ते हुए देखने वाली एक बेवा औरत एवं अपने प्रियजनों को खोने वाले बाकी लोग चार दशक से न्याय की बाट जोहते हुए बृहस्पतिवार को दिल्ली की एक अदालत के बाहर ठिठके से नजर आये।

पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार को 1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान जनकपुरी और विकासपुरी क्षेत्रों में हिंसा भड़काने के आरोप से संबंधित एक मामले में बरी किए जाने के बाद संबंधित परिवारों ने कहा कि न्याय की प्रक्रिया लंबी, थका देने वाली और क्रूरतापूर्वक अपूर्ण रही है।

दिल्ली की एक अदालत ने पूर्व कांग्रेस नेता एवं पूर्व सांसद सज्जन कुमार को बृहस्पतिवार को बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।

हालांकि इस दोषमुक्ति के बावजूद, कुमार दंगा संबंधी हत्या के अन्य मामलों में उम्रकैद की सजा के कारण जेल में ही हैं।

अदालत कक्ष के बाहर खड़ी निर्मल कौर ने आग की लपटों से झुलसे अपने बचपन की कहानी सुनाई।

उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘मेरी आंखों के सामने मेरे पिता को जिंदा जला दिया गया था। मैंने 42 साल एक अदालत से दूसरी अदालत के चक्कर लगाते हुए इस आस में बिताए हैं कि एक दिन न्याय जरूर मिलेगा।’’

उन्होंने कहा कि उस दिन उनका परिवार तबाह हो गया। उन्होंने कहा, ‘‘मैं खुद तबाह हो गई और मेरे जीवन की हर अच्छी चीज मुझसे छीन ली गई।’’

उन्होंने कहा कि उन्हें अफसोस है कि दशकों की उम्मीद के बाद भी उन्हें न्याय नहीं मिला।

उनके बगल में एक और महिला खड़ी थी जिसकी आवाज क्रोध और निराशा से कांप रही थी। उसने कहा कि जो व्यक्ति दोषी है उसे फांसी दी जानी चाहिए। उसने चेतावनी दी कि यदि ऐसा नहीं हुआ, तो वह अदालत के बाहर ही रहेगी, भले ही इसका मतलब वहीं प्राण त्याग देना हो। उसने कहा कि उसके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं बचा है।

दंगा पीड़ित एक परिवार के एक अन्य सदस्य वजीर सिंह ने कहा कि कुमार पर हत्या के लगभग 18 मामले दर्ज हैं लेकिन उसे बरी कर दिया गया ।

उन्होंने कहा कि अगर न्याय नहीं मिला तो वह उच्च न्यायालय और यहां तक ​​कि उच्चतम न्यायालय में भी अपील करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा कि वह अब लड़ने से नहीं डरते हैं।

बागी कौर को दंगों की यादें आज भी रह रह कर डराती हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘मेरे परिवार के दस सदस्य मारे गए। मुझे अच्छी तरह याद है कि दंगों के दौरान सड़कें लाशों से भरी पड़ी थीं। सड़क पार करने के लिए लाशों के ऊपर से कूदकर जाना पड़ता था।”

उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने परिवार के सपनों को चकनाचूर होते देखा तथा इन सभी वर्षों में एक भी दिन ऐसा नहीं बीता जब उन्होंने अदालत की सुनवाई में भाग न लिया हो, चाहे परिस्थितियां कैसी भी रही हों।

कौर ने कहा, ‘‘हमारे दर्द को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है। सतवंत सिंह को फांसी दे दी गई; तो फिर लगभग एक हजार लोगों की मौत के लिए जिम्मेदार व्यक्ति अब भी जिंदा क्यों है?’’

न्याय के लिए 42 साल के अपने संघर्ष को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि अदालत में हर कोई जानता था कि वह किसकी विधवा है, फिर भी कोई भी उसकी गुहार सुनने को तैयार नहीं था।

अदालत के बाहर से प्रदर्शनकारियों ने जाने से इनकार कर दिया। फैसला सुनाए जाने के काफी देर बाद भी उनकी आवाजें पूरे इलाके में गूंजती रहीं।

इन परिवारों के लिए यह फैसला महज एक कानूनी निर्णय नहीं था बल्कि उन घावों को फिर से हरा कर देने वाला था जो कभी भरे नहीं थे और जिनमें थीं- खोई हुई जिंदगियां, रौंदा गया बचपन और 40 वर्षों से अधिक समय से संजोया हुआ दुख।

भाषा राजकुमार नरेश

नरेश


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