न्यायालय की पीठ को ‘अंधेरे में रखा गया था’ : एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक विवाद पर विशेषज्ञ का दावा
न्यायालय की पीठ को ‘अंधेरे में रखा गया था’ : एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक विवाद पर विशेषज्ञ का दावा
(कोमल शर्मा)
नयी दिल्ली, 27 मई (भाषा) विवादों में घिरे शिक्षाविद् मिशेल डैनिनो ने बुधवार को दावा किया कि उनके काम के व्यापक संदर्भ के बारे में शीर्ष अदालत को “अंधेरे में रखा गया था”।
डैनिनो राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के उन तीन शिक्षाविदों में से एक हैं जिन्हें न्यायपालिका पर एक विवादास्पद अध्याय को लेकर उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया था।
उन्होंने यह भी कहा कि शीर्ष अदालत का 11 मार्च का प्रारंभिक आदेश “आश्चर्यजनक” था क्योंकि फैसला सुनाए जाने से पहले शिक्षाविदों की बात नहीं सुनी गई थी।
न्यायालय ने पिछले हफ्ते अपने 11 मार्च के उस आदेश में संशोधन किया था जिसमें केंद्र, राज्यों और अन्य को तीनों शिक्षाविदों से दूरी बनाने का निर्देश दिया गया था। यह संशोधन एनसीईआरटी की एक पुस्तक के अध्याय में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित “आपत्तिजनक” सामग्री को लेकर हुए विवाद के बाद किया गया था।
न्यायालय ने केंद्र, राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, सार्वजनिक विश्वविद्यालयों और केंद्र या राज्य सरकारों से धन प्राप्त करने वाले संस्थानों को 11 मार्च के आदेश में की गई उसकी टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना, इस मुद्दे पर स्वतंत्र निर्णय लेने की छूट दी है।
फ्रांस में जन्मे भारतीय विद्वान डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार कक्षा 8 की पाठ्यपुस्तक के विवादास्पद अध्याय से जुड़े तीन शिक्षाविद थे।
‘पीटीआई-भाषा’ के साथ एक साक्षात्कार में, डैनिनो ने कहा कि “अभूतपूर्व” आदेश का शैक्षणिक संस्थानों पर “भयभीत करने वाला प्रभाव” पड़ा है, लेकिन उन्होंने आगे कहा कि शिक्षाविदों को विश्वास है कि न्यायालय को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 और राष्ट्रीय विद्यालय शिक्षा पाठ्यक्रम ढांचा (एनसीएफ-एसई) 2023 के तहत जनादेश सहित पूरी पृष्ठभूमि से अवगत कराए जाने के बाद अंततः प्रतिबंध हटा लिया जाएगा।
डैनिनो ने कहा, “प्रतिबंध के बारे में शुरुआती प्रतिक्रिया चौंकाने वाली थी क्योंकि सबसे पहले तो हमारी बात सुनी ही नहीं गई थी और तकनीकी रूप से यह एकतरफा आदेश था।”
उन्होंने कहा, “इसकी गंभीरता को देखते हुए, और यह तथ्य कि इस तरह का प्रतिबंध भारत के न्यायिक या शैक्षणिक इतिहास में मेरी जानकारी के अनुसार अभूतपूर्व है, इसका निश्चित रूप से सभी संस्थानों पर भयावह और डराने वाला प्रभाव है, इसलिए यह निश्चित रूप से आश्चर्यजनक था।”
डैनिनो ने दावा किया कि उच्चतम न्यायालय को शुरू में “तस्वीर का केवल एक बहुत छोटा हिस्सा” दिखाया गया था और उसे उस ढांचे के बारे में सूचित नहीं किया गया था जिसके तहत पाठ्यपुस्तक का अध्याय तैयार किया गया था।
उन्होंने कहा, “उच्चतम न्यायालय को संदर्भ की जानकारी नहीं थी। उसे उस जनादेश की जानकारी नहीं थी जिसके तहत हम काम कर रहे थे – 2020 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति और 2023 का राष्ट्रीय विद्यालय शिक्षा पाठ्यक्रम ढांचा। ये दोनों मूलभूत दस्तावेज हमारे काम के जनादेश को बहुत स्पष्ट रूप से परिभाषित करते हैं।”
अदालत द्वारा एनसीईआरटी को “आपत्तिजनक अध्याय” के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान बताने और उनकी योग्यता प्रस्तुत करने के निर्देश का हवाला देते हुए, डैनिनो ने दावा किया कि संस्थान ने केवल तीन शिक्षाविदों के नाम साझा किए, लेकिन प्रक्रिया की निगरानी करने वाली समितियों या उनकी योग्यताओं का कोई विवरण नहीं दिया।
उन्होंने कहा, “एनसीईआरटी ने हमारे तीनों के नाम तो दे दिए, लेकिन यह नहीं बताया कि हम किस अधिकार-क्षेत्र के तहत काम कर रहे थे। साथ ही, उन दो शीर्ष समितियों का व्यापक संदर्भ भी नहीं दिया, जिन्होंने उन अध्यायों को अंतिम रूप दिया था, और न ही हमारी योग्यता संबंधी जानकारी साझा की।”
उन्होंने आगे कहा, “असल में, उच्चतम न्यायालय की पीठ को उस वास्तविक संदर्भ के बारे में पूरी तरह अंधेरे में रखा गया, जिसके तहत हम काम कर रहे थे।”
डैनिनो ने कहा कि तीनों शिक्षाविदों को अब भी उम्मीद है कि उनकी बात सुने जाने के बाद न्यायालय अपने आदेश पर पुनर्विचार करेगा।
भाषा प्रशांत नरेश
नरेश

Facebook


