न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में अधिकारियों के तबादले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की

न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में अधिकारियों के तबादले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की

न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में अधिकारियों के तबादले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की
Modified Date: April 16, 2026 / 04:59 pm IST
Published Date: April 16, 2026 4:59 pm IST

नयी दिल्ली, 16 अप्रैल (भाषा) पश्चिम बंगाल सरकार और निर्वाचन आयोग के बीच अविश्वास को उजागर करते हुए उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को चुनाव निकाय द्वारा राज्य में 1,000 से अधिक प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों के तबादलों को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया।

उच्चतम न्यायालय ने हालांकि इस विवादास्पद कानूनी प्रश्न को भविष्य में विचार के लिए खुला रखा कि क्या निर्वाचन आयोग (ईसी) को चुनाव वाले राज्यों में प्रशासनिक परिवर्तन करने से पहले संबंधित राज्य से परामर्श करने की आवश्यकता है।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि यह देश का “दुर्भाग्य” है कि अखिल भारतीय सेवाओं के निर्माण का उद्देश्य विफल हो रहा है।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की कवायद में न्यायालय को न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति करनी पड़ी क्योंकि पक्षों के बीच विश्वास की कमी थी।

पीठ ने कहा, “उन्हें राज्य सरकार के अधिकारियों पर भरोसा नहीं है और राज्य को उनके द्वारा (चुनाव आयोग द्वारा) लाए गए अधिकारियों पर भरोसा नहीं है।”

उच्चतम न्यायालय ने 31 मार्च के कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।

पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा अधिकारियों के तबादलों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका को उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया था।

पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा के लिए चुनाव दो चरणों में – 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को- होंगे।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अर्का कुमार नाग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने कहा कि पहली बार किसी राज्य के मुख्य सचिव का इस तरह से तबादला किया गया है।

उन्होंने कहा कि विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद पश्चिम बंगाल में लगभग 1,100 अधिकारियों का “रातोंरात” तबादला कर दिया गया।

पीठ ने टिप्पणी की, “ऐसा पहली बार नहीं हुआ है या ऐसा सिर्फ इसी राज्य में नहीं हुआ है”।

बनर्जी ने तर्क दिया कि निर्वाचन आयोग को इस तरह के तबादलों को प्रभावी करने से पहले राज्य से परामर्श करने की आवश्यकता है।

प्रधान न्यायाधीश ने पूछा, “जिन अधिकारियों का तबादला या पदस्थापन हुआ है, वे सभी पश्चिम बंगाल कैडर के हैं। ऐसा नहीं है कि अन्य राज्यों के अधिकारियों की नियुक्ति की गई है। ये सभी पश्चिम बंगाल राज्य के सेवारत अधिकारी हैं। चाहे वे ‘ए’ पद पर हों या ‘बी’ पद पर, इससे क्या फर्क पड़ता है?”

बनर्जी ने कहा कि निर्वाचन आयोग ने पश्चिम बंगाल में मुख्य सचिव, डीजीपी और कई पुलिस अधीक्षकों सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को बदल दिया है।

बनर्जी ने कहा कि याचिकाकर्ता यह तर्क नहीं दे रहा है कि न्यायालय को अधिकारियों के तबादलों पर रोक लगानी चाहिए, बल्कि उसने इस मामले में कानून का एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है।

पीठ ने कहा, “हम उचित मामले में इस पर निर्णय लेंगे। हम कानून के प्रश्न को खुला रखेंगे।”

चुनाव वाले राज्य में संबंधित राज्य सरकार से परामर्श किए बिना निर्वाचन आयोग द्वारा अधिकारियों का तबादला करना सही नहीं है, यह तर्क देते हुए बनर्जी ने कहा, “लगभग 1,100 अधिकारियों का तबादला रातोंरात कर दिया गया। पहली बार किसी मुख्य सचिव का तबादला हुआ है।”

प्रधान न्यायाधीश ने टिप्पणी की, “यह इस देश का दुर्भाग्य है कि अखिल भारतीय सेवाओं के निर्माण का उद्देश्य विफल हो रहा है।”

पीठ ने यह भी कहा कि राज्य के बाहर से चुनाव पर्यवेक्षकों की नियुक्ति कोई नयी बात नहीं है।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, “हमें पश्चिम बंगाल के चुनावों को ध्यान में नहीं रखना चाहिए। राज्य के बाहर से पर्यवेक्षक की नियुक्ति हमेशा आदर्श होती है।”

न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की, “चुनावी मुकदमों के लिए पश्चिम बंगाल के चुनाव एक सुनहरा अवसर साबित हुए हैं।”

पीठ ने विधि के प्रश्न को खुला रखते हुए याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया।

भाषा प्रशांत नरेश

नरेश


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