स्कूलों को पढ़ाई के साथ-साथ छात्रों की भावनात्मक सेहत को भी प्राथमिकता देनी चाहिए : विशेषज्ञ

स्कूलों को पढ़ाई के साथ-साथ छात्रों की भावनात्मक सेहत को भी प्राथमिकता देनी चाहिए : विशेषज्ञ

स्कूलों को पढ़ाई के साथ-साथ छात्रों की भावनात्मक सेहत को भी प्राथमिकता देनी चाहिए : विशेषज्ञ
Modified Date: July 19, 2026 / 05:18 pm IST
Published Date: July 19, 2026 5:18 pm IST

नयी दिल्ली, 19 जुलाई (भाषा) परीक्षा के तनाव, ज्यादा समय तक स्क्रीन का इस्तेमाल, सोशल मीडिया के दबाव, ‘बुलिंग’ और अकेलापन आज स्कूली छात्रों के लिए बड़ी समस्याएं बनते जा रहे हैं, जिसे देखते हुए शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कहा है कि बच्चों की भावनात्मक सेहत को शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

विशेषज्ञों का कहना है कि स्कूलों को सफलता को केवल अच्छे अंकों और पढ़ाई के प्रदर्शन से नहीं मापना चाहिए, इसके बजाय ऐसे माहौल बनाना चाहिए, जहां छात्र खुद को सुरक्षित महसूस करें, सहयोग पा सकें और भावनात्मक रूप से मजबूत बन सकें।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, 10 से 19 वर्ष की उम्र के हर सात में से एक किशोर किसी न किसी मानसिक समस्या से जूझ रहा है, जिसमें अवसाद, चिंता और व्यवहार संबंधी समस्याएं शामिल हैं।

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) और राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने बच्चों में बढ़ते तनाव और स्कूलों में बेहतर काउंसलिंग सहायता व मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता की जरूरत पर ध्यान दिलाया है।

दिल्ली एम्स के मनोचिकित्सा विभाग के प्रोफेसर डॉ. नंद कुमार ने कहा, ‘आज स्कूलों में बच्चे पहले की तुलना में बहुत कम उम्र में ही ज्यादा चिंता, हर काम में माहिर होने की चाह, असफल होने के डर और मानसिक थकान जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं।’

उन्होंने कहा कि पढ़ाई में बच्चों की सफलता जरूरी है, लेकिन इसके लिए उनकी मानसिक सेहत को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।

डॉ. कुमार ने कहा कि हर स्कूल में बच्चों को मानसिक रूप से मजबूत बनाने के लिए शुरुआती स्तर पर व्यवस्था होनी चाहिए और भावनात्मक परेशानी की पहचान करने, प्रशिक्षित काउंसलर उपलब्ध कराने और शिक्षकों को बच्चों के व्यवहार में बदलाव पहचानने के लिए तैयार करने की जरूरत है, ताकि समस्याओं को गंभीर मानसिक बीमारियों में बदलने से पहले रोका जा सके।

सेठ आनंद राम जयपुरिया ग्रुप ऑफ एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस के चेयरमैन और शिक्षा विशेषज्ञ शिशिर जयपुरिया ने कहा, ‘आज की शिक्षा व्यवस्था को बच्चों को केवल परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए नहीं, बल्कि असफलताओं, अनिश्चितताओं और आपसी संबंधों से निपटने के लिए भी तैयार करना चाहिए।”

उन्होंने कहा, “स्कूलों को सामाजिक-भावनात्मक शिक्षा, ध्यान, छात्रों के बीच सहयोग और काउंसलर से नियमित बातचीत को स्कूल व्यवस्था का हिस्सा बनाना चाहिए। बच्चे की भावनात्मक सेहत उतनी ही जरूरी है, जितनी उसकी पढ़ाई में सफलता। दोनों साथ-साथ आगे बढ़नी चाहिए।’

भाषा जोहेब दिलीप

दिलीप


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