शिवसेना विवाद : न्यायालय ने कहा-पहले यह देखना होगा कि पार्टी में विभाजन हुआ था या नहीं
शिवसेना विवाद : न्यायालय ने कहा-पहले यह देखना होगा कि पार्टी में विभाजन हुआ था या नहीं
नयी दिल्ली, 12 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि उसे पहले यह देखना होगा कि क्या शिवसेना में विभाजन हुआ था, क्योंकि ऐसा विभाजन विधायक दल से शुरू हो सकता है और उसका असर संगठन एवं प्राथमिक सदस्यता तक पहुंच सकता है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने यह टिप्पणी उद्धव ठाकरे गुट की ओर से निर्वाचन आयोग के उस फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई के दौरान की, जिसमें एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को असली शिवसेना माना गया था और उसे पार्टी का नाम तथा ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया था।
सुनवाई के चौथे दिन न्यायमूर्ति बागची ने कहा, ‘‘पहले हमें यह देखना होगा कि क्या विभाजन हुआ है। विभाजन विधायक दल से शुरू हो सकता है, लेकिन उसका असर संगठन और प्राथमिक सदस्यता तक पहुंच सकता है।’’
इसपर उद्धव गुट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा, ‘‘कानून के सिद्धांत के तौर पर, किसी राजनीतिक दल में विभाजन केवल विधायक दल में विभाजन से नहीं हो सकता। संविधान पीठ ने (एक फैसले में) यह तय किया है।’’
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि फैसले में कहा गया है कि प्रस्तावित विभाजन को केवल विधायक दल के सदस्यों में हुए विभाजन तक सीमित नहीं किया जा सकता। न्यायाधीश ने कहा, ‘‘लेकिन इसमें यह नहीं कहा गया है कि यदि विभाजन विधायक दल में शुरू होता है और बाद में संगठन तथा प्राथमिक सदस्यता में भी दिखाई देता है, तो उसे माना नहीं जा सकता। यह बड़े विभाजन का केंद्र हो सकता है।’’
सिब्बल ने कहा कि फैसले में विधायक दल का उल्लेख नहीं है। पीठ ने कहा कि उसे इस पहलू पर स्पष्टता की जरूरत है।
पीठ ने कहा, ‘‘शिंदे गुट को 11 ‘राज्य प्रभारियों’ का समर्थन था। राज्य प्रभारी पार्टी के ढांचे का हिस्सा होता है। यह शिवसेना के संगठनात्मक ढांचे से बाहर की कोई चीज नहीं है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि जब हम किसी राजनीतिक दल पर विचार करते हैं, तो हमारा सरोकार केवल पदाधिकारियों से नहीं होता। हमें प्राथमिक सदस्यता पर भी विचार करना होता है।’’
सिब्बल ने यह निर्धारित करने के निर्वाचन आयोग के दृष्टिकोण पर सवाल उठाया कि क्या पार्टी के भीतर वास्तविक विवाद था और क्या आयोग का रुख करने वाले गुट ने शिवसेना के संविधान के तहत उपलब्ध आंतरिक उपायों का इस्तेमाल कर लिया था।
उन्होंने कहा कि आयोग के तर्क का मतलब यह था कि किसी गुट को आंतरिक उपायों का सहारा लेना जरूरी था, भले ही प्रतिद्वंद्वी गुट पहले ही दूसरे स्थान पर जा चुका हो, सरकार बना चुका हो और खुद पार्टी के संविधान के विपरीत काम कर चुका हो।
सिब्बल ने शिवसेना के संगठनात्मक ढांचे के आयोग के आकलन को भी चुनौती दी, जिसमें पार्टी प्रमुख की शक्तियां और विभिन्न संगठनात्मक पदों को भरने के तरीके शामिल थे।
सिब्बल ने सवाल किया, ‘‘सवाल यह है कि निर्वाचन आयोग यह तय करने वाला कौन होता है कि किस स्तर पर, किन पदों के लिए और कितने लोगों का चुनाव होना चाहिए।’’
उन्होंने कहा कि आयोग के समक्ष पार्टी के संविधान की वैधता, उसके तहत हुए चुनावों या उसके तहत की गई नियुक्तियों को लेकर कोई विवाद नहीं था।
उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग द्वारा पार्टी के संविधान को ‘‘निरंकुश’’ बताने का उद्देश्य संगठनात्मक ढांचे को विचार से बाहर करना और अंततः चुनाव चिह्न विवाद का फैसला विधायक दल के सदस्यों के बहुमत के आधार पर करना था।
उन्होंने कहा, ‘‘आप पहले ही नतीजा तय कर लेते हैं और फिर उस तक पहुंचने के लिए तर्क को अपने हिसाब से ढालते हैं। यह पैराग्राफ 15 के तहत परिकल्पित प्रक्रिया के बिल्कुल विपरीत है।’’
पीठ ने इस बात की पड़ताल की कि क्या विधायक दल के सदस्यों से शुरू हुआ विभाजन बाद में व्यापक पार्टी संगठन और प्राथमिक सदस्यता में भी दिखाई दे सकता है तथा क्या पैराग्राफ 15 के तहत विवाद का फैसला करते समय निर्वाचन आयोग ऐसे घटनाक्रम पर विचार कर सकता है।
सिब्बल ने दोहराया कि कानून की दृष्टि से किसी राजनीतिक दल में विभाजन केवल उसके विधायक दल के सदस्यों में विभाजन से नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि एक बार राजनीतिक दल में प्रथमदृष्टया विभाजन स्थापित हो जाने के बाद आयोग अपने अंतिम फैसले पर पहुंचते समय बाद के घटनाक्रमों पर विचार कर सकता है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि यदि निर्वाचन आयोग के पास प्रथमदृष्टया अधिकार क्षेत्र था, लेकिन उसने उसका गलत तरीके से इस्तेमाल किया या स्थापित सिद्धांतों के विपरीत दृष्टिकोण अपनाया, तो यह उस स्थिति से अलग होगा, जिसमें उसके पास अधिकार क्षेत्र ही नहीं था।
सिब्बल ने कहा कि निर्वाचन आयोग पैराग्राफ 15 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल तभी कर सकता है, जब उसके अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल किए जाने के समय राजनीतिक दल में विभाजन हुआ हो।
उन्होंने कहा कि शिंदे के बाद में मुख्यमंत्री बनने की स्थिति का इस्तेमाल उनके गुट को अधिक समर्थन मिलने के प्रमाण के तौर पर नहीं किया जा सकता, क्योंकि पार्टी के सदस्य और अन्य लोग स्वाभाविक रूप से उस व्यक्ति के साथ जुड़ेंगे जो उस पद पर है।
सिब्बल ने कहा, ‘‘वह (शिंदे) मुख्यमंत्री बने। हमारे अनुसार, उन्हें अवैध तरीके से मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया था। आप पहले उन्हें मुख्यमंत्री नियुक्त नहीं कर सकते और फिर यह नहीं कह सकते कि बाद में इतने लोग उनके साथ जुड़ गए और इसलिए उनके पास अधिक समर्थन है।’’
सुनवाई बृहस्पतिवार को जारी रहेगी।
पीठ उद्धव गुट की ओर से 2024 में दायर दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें निर्वाचन आयोग के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया था।
याचिकाओं में निर्वाचन आयोग के 17 फरवरी, 2023 के उस आदेश को भी चुनौती दी गई है, जिसमें शिंदे गुट को असली शिवसेना के रूप में मान्यता दी गई थी।
भाषा अमित सुरेश
सुरेश

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