सोनम वांगचुक के भाषण का मकसद हिंसा फैलाना नहीं, बल्कि उसे खत्म करना था : पत्नी ने न्यायालय को बताया

सोनम वांगचुक के भाषण का मकसद हिंसा फैलाना नहीं, बल्कि उसे खत्म करना था : पत्नी ने न्यायालय को बताया

सोनम वांगचुक के भाषण का मकसद हिंसा फैलाना नहीं, बल्कि उसे खत्म करना था : पत्नी ने न्यायालय को बताया
Modified Date: January 8, 2026 / 08:37 pm IST
Published Date: January 8, 2026 8:37 pm IST

नयी दिल्ली, आठ जनवरी (भाषा) जेल में बंद जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की पत्नी, गीतांजलि जे आंगमो ने बृहस्पतिवार को उच्चतम न्यायालय को बताया कि उनके पति के भाषण का मकसद हिंसा फैलाना नहीं, बल्कि उसे खत्म कराना था, और उन्हें अपराधी दिखाने के लिए तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है।

गीतांजलि ने शीर्ष अदालत को यह भी बताया कि वांगचुक को उनकी हिरासत के ‘पूरे आधार’ नहीं बताए गए और उन्हें हिरासत के खिलाफ संबंधित प्राधिकारियों के समक्ष अपनी बात रखने का सही मौका नहीं दिया गया।

इस मामले में सुनवाई अधूरी रही और 12 जनवरी को जारी रहेगी।

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लद्दाख के लिए राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची की मांग को लेकर हिंसक विरोध प्रदर्शनों के दो दिन बाद वांगचुक को 26 सितंबर 2025 को कड़े राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत हिरासत में लिया गया था। इस विरोध प्रदर्शनो में केंद्र शासित प्रदेश में चार लोग मारे गए और 90 अन्य घायल हो गए थे। सरकार ने उन पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया है।

रासुका केंद्र और राज्यों को व्यक्तियों को ऐसे काम करने से रोकने के लिए हिरासत में लेने का अधिकार देता है जो ‘देश की रक्षा के लिए हानिकारक’ हों। अधिकतम हिरासत की अवधि 12 महीने है, हालांकि इसे पहले भी वापस लिया जा सकता है।

गीतांजलि की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने न्यायाधीश न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले की पीठ को बताया कि वांगचुक को प्रशासन ने हानिकारक गतिविधियों में शामिल होने से रोकने के लिए हिरासत में लिया था।

शीर्ष अदालत में वांगचुक के भाषण का वीडियो चलाते हुए सिब्बल ने कहा कि जलवायु कार्यकर्ता ने भूख हड़ताल समाप्त करते समय यह भाषण दिया था।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, ‘‘मैंने कहा कि मैं इस हिंसा को स्वीकार नहीं कर सकता, और हमें इस हिंसा को रोकना चाहिए, और मैं आपसे इस हिंसा को रोकने की अपील कर रहा हूं। यही वह वीडियो था जो मैं आपके सामने चलाना चाहता था। आपको याद होगा कि चौरी-चौरा घटना के बाद जब हिंसा हुई थी, तो गांधीजी ने भी ऐसा ही किया था।’’

सिब्बल ने साथ ही यह भी कहा कि तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है ताकि वांगचुक को ‘‘अपराधी’’ दिखाया जा सके।

सिब्बल ने कहा, ‘‘भाषण का लहजा किसी भी तरह से राज्य की सुरक्षा के लिए खतरा नहीं है या यह नहीं है कि मैं ऐसी गतिविधियाँ जारी रखूंगा या हिंसा फैलाऊंगा, बल्कि इसे शांत करने के लिए है।’’

अधिवक्ता ने कहा, ‘‘जरूरी वीडियो जो प्रशासन के पास था, उसे हिरासत में लेने वाले अधिकारियों के समक्ष पेश नही किया गया। इसका मकसद यह था कि 24 सितंबर 2025 को असल में क्या हुआ था, इसकी जानकारी के बिना ही हिरासत का निर्देश जारी कर दिया जाये।’’

सिब्बल ने अदालत को बताया कि चार वीडियो को छोड़कर बाकी सभी दस्तावेज वाली पेन ड्राइव 29 सितंबर 2025 को दी गई थी।

उन्होंने आरोप लगाया, ‘‘26 सितंबर, 2025 को हिरासत के आदेश के पीछे के मुख्य कारण वे चार वीडियो थे जिन पर हिरासत में लेने वाले अधिकारी ने भरोसा किया था। ये वीडियो 10 सितंबर, 11 सितंबर और दो वीडियो 24 सितंबर के थे। हालांकि, जब 29 सितंबर को हिरासत के कारण बताए गए, तो वे चार वीडियो हिरासत में लिए गए व्यक्ति को नहीं दिए गए।’’

सिब्बल ने कहा कि हिरासत के कारण वांगचुक को 28 दिनों की भारी देरी के बाद बताए गए, जो संविधान के अनुच्छेद 22 का स्पष्ट उल्लंघन है।

अनुच्छेद 22 मनमानी गिरफ्तारी और हिरासत के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है।

इस बात पर जोर देते हुए सिब्बल ने कहा कि कानून के मुताबिक अगर हिरासत के आधार बंदी को नहीं बताए जाते हैं, तो हिरासत का आदेश ‘अमान्य’ हो जाता है।

बंदी को हिरासत के आधार और उनसे जुड़े दस्तावेज़ दिए जाने का अधिकार है। अगर इन्हें देने में कोई कमी या देरी होती है, तो यह प्रभावी प्रतिनिधित्व करने के अधिकार से इनकार माना जाएगा।

सिब्बल ने गीतांजलि की याचिका पर लेह प्रशासन के जवाब का विरोध किया और दलील दी कि चार वीडियो को छोड़कर सभी दस्तावेज़ों वाली पेन ड्राइव 29 सितंबर 2025 को दी गई थी।

भाषा रंजन नरेश

नरेश


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