Supreme Court Hinduism Remarks: ‘हिंदू बने रहने के लिए मंदिर जाना जरूरी नहीं’, इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा बयान, कहा-दीपक जलाने से…

Supreme Court Hinduism Remarks: हिंदुत्व को जीवन शैली बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक अहम टिप्पणी की है, जिसमें कहा गया कि हिंदू बने रहने के लिए किसी व्यक्ति का मंदिर जाना या कोई धार्मिक अनुष्ठान करना अनिवार्य नहीं है।

Supreme Court Hinduism Remarks: ‘हिंदू बने रहने के लिए मंदिर जाना जरूरी नहीं’, इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा बयान, कहा-दीपक जलाने से…

supreme court/ image source: ibc24

Modified Date: May 13, 2026 / 11:55 pm IST
Published Date: May 13, 2026 11:50 pm IST
HIGHLIGHTS
  • सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
  • हिंदुत्व को जीवन शैली
  • कहा मंदिर जाना अनिवार्य नहीं

Supreme Court Hinduism Remarks: नई दिल्ली। हिंदुत्व को जीवन शैली बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की है, जिसमें कहा गया कि हिंदू बने रहने के लिए किसी व्यक्ति का मंदिर जाना या कोई धार्मिक अनुष्ठान करना अनिवार्य नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि घर में दीपक जलाना भी आस्था और धर्म के पालन का पर्याप्त प्रमाण माना जा सकता है।

Supreme Court News: सुनवाई के दौरान क्या कहा गया?

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की संविधान पीठ ने यह टिप्पणी केरल के सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले कथित भेदभाव और दाऊदी बोहरा समुदाय सहित अन्य धार्मिक प्रथाओं से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान की।

सुनवाई के 15वें दिन बहस के दौरान एक हस्तक्षेपकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता जी मोहन गोपाल ने कहा कि धार्मिक समुदायों के भीतर भी सामाजिक न्याय की मांग उठ रही है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या आज हर व्यक्ति जो स्वयं को हिंदू कहता है, वास्तव में वेदों को सर्वोच्च मानता है।

इस पर संविधान पीठ में शामिल जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि “इसीलिए हिंदुत्व को जीवन शैली कहा जाता है।” उन्होंने आगे कहा कि हिंदू बने रहने के लिए किसी प्रकार की कर्मकांडीय अनिवार्यता नहीं है और न ही किसी को अपने धर्म के पालन से रोका जा सकता है।

CJI की अहम टिप्पणी

प्रधान न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपनी झोपड़ी में दीपक जलाता है, तो यह भी उसकी आस्था को दर्शाने के लिए पर्याप्त है। अदालत ने संकेत दिया कि धार्मिक पहचान केवल बाहरी अनुष्ठानों पर निर्भर नहीं करती।

मामला क्यों है अहम?

यह सुनवाई धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे, महिलाओं के अधिकार और विभिन्न धार्मिक प्रथाओं की संवैधानिक वैधता से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों पर केंद्रित है। अदालत ने पहले भी कहा था कि यदि हर धार्मिक प्रथा को अदालत में चुनौती दी जाने लगी, तो इससे न्यायिक व्यवस्था पर अत्यधिक बोझ पड़ेगा और धार्मिक संतुलन प्रभावित हो सकता है।

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