न्यायालय ने डीजीपी की नियुक्ति से जुड़े मामले में फैसला सुरक्षित रखा
न्यायालय ने डीजीपी की नियुक्ति से जुड़े मामले में फैसला सुरक्षित रखा
नयी दिल्ली, 29 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अधिकतर राज्य अपनी पसंद के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) नियुक्त करने के लिए डीजीपी की नियुक्ति से जुड़े प्रकाश सिंह मामले में दिए गए फैसले का पालन करने से बचते हैं।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने यह टिप्पणी ओडिशा सरकार द्वारा राज्य के डीजीपी पद पर नियुक्ति के लिए उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आदेश सुरक्षित रखते हुए की।
पीठ ने 24 सितंबर को ओडिशा सरकार से पूछा था कि क्या उसने एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी, जिनका नाम डीजीपी पद के लिए विचार किए जा रहे अधिकारियों की सूची से हटा दिया गया था, को आरोपी की श्रेणी में रखा है। सीबीआई ने कहा था कि भर्ती परीक्षा घोटाला मामले में उनसे पूछताछ की जरूरत पड़ सकती है।
फैसला सुरक्षित रखते हुए प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि पीठ यह देखेगी कि ओडिशा और झारखंड में डीजीपी की नियुक्ति शीर्ष अदालत के प्रकाश सिंह मामले में दिए गए फैसले के तहत जारी निर्देशों के अनुसार की गई थी या नहीं।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘राज्य नियुक्ति प्रक्रिया को पटरी से उतारना चाहते हैं और प्रकाश सिंह मामले में दिए गए फैसले का पालन नहीं करना चाहते… वे अपनी पसंद का डीजीपी चाहते हैं।’’
शीर्ष अदालत ने संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के रवैये पर भी कड़ी नाराजगी जताई।
अदालत ने कहा कि राज्यों की ओर से उपलब्ध कराई गई सूची में से भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के वरिष्ठ अधिकारियों के तीन नामों को डीजीपी नियुक्ति के लिए छांटने का जिम्मा यूपीएससी को दिया गया था, लेकिन उसने इस काम में लापरवाही भरा रवैया अपनाया।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘डीजीपी की नियुक्ति इस अदालत के न्यायिक आदेशों के तहत होती है। प्रत्येक राज्य को हमें संतुष्ट करना होगा कि नियुक्ति इस अदालत के आदेशों के अनुरूप है।’’
पीठ ने एक जनहित याचिका (पीआईएल) और अन्य याचिकाओं पर सुनवाई की, जिनमें आरोप लगाया गया है कि ओडिशा सरकार शीर्ष अदालत के 2006 के फैसले में जारी निर्देशों के विपरीत डीजीपी पद के लिए विचार किए जाने वाले अधिकारियों की सूची में एक अपेक्षाकृत कनिष्ठ अधिकारी को शामिल करने का प्रयास कर रही है।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी सुशांत कुमार नाथ को सूची से बाहर किए जाने के मुद्दे पर भी विचार-विमर्श किया गया। सीबीआई ने राज्य को सूचित किया था कि ओडिशा पुलिस भर्ती परीक्षा से जुड़ी जांच के सिलसिले में नाथ से पूछताछ की आवश्यकता पड़ सकती है।
ओडिशा सरकार ने शुरुआत में डीजीपी पद के लिए विचार किए जाने को लेकर मई में 11 वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों की एक सूची यूपीएससी को भेजी थी। लेकिन सीबीआई के पत्राचार के बाद नाथ का नाम वापस ले लिया गया।
ओडिशा की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि सीबीआई ने चार अगस्त को राज्य को सूचित किया था कि जरूरी अनुमति मिलने और संबंधित अधिकारियों से सवाल-जवाब के बाद परीक्षा आयोजित होने के समय ओडिशा पुलिस भर्ती बोर्ड के अध्यक्ष रहे नाथ से पूछताछ की जा सकती है।
अदालत को बताया गया कि इसके बाद राज्य ने नाथ का सत्यनिष्ठा प्रमाण पत्र रोक लिया और 10 अधिकारियों के सत्यनिष्ठा प्रमाणपत्र के साथ संशोधित प्रस्ताव भेजा।
वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने नाथ की ओर से अदालत में कहा कि ऐसी कोई प्राथमिकी (एफआईआर) नहीं है, जिसमें अधिकारी को आरोपी बनाया गया हो।
हाल ही में ओडिशा ने मौजूदा डीजीपी वाई. बी. खुरानिया के 16 अगस्त को सेवानिवृत्त होने के बाद वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी विनयतोश मिश्रा को कार्यवाहक डीजीपी नियुक्त किया है।
भाषा संतोष नरेश
नरेश

Facebook


