उच्चतम न्यायालय के कार्यबल का सर्वे: नौ प्रतिशत छात्रों ने आत्महत्या के विचार आने की बात स्वीकारी

उच्चतम न्यायालय के कार्यबल का सर्वे: नौ प्रतिशत छात्रों ने आत्महत्या के विचार आने की बात स्वीकारी

उच्चतम न्यायालय के कार्यबल का सर्वे: नौ प्रतिशत छात्रों ने आत्महत्या के विचार आने की बात स्वीकारी
Modified Date: September 29, 2026 / 06:31 pm IST
Published Date: September 29, 2026 6:31 pm IST

(गुंजन शर्मा)

नयी दिल्ली, 29 सितंबर (भाषा) उच्च शिक्षण संस्थानों के करीब 15 प्रतिशत छात्रों ने स्वीकार किया है कि पिछले छह महीनों में वे ऐसे दौर से गुजरे, जब उन्होंने खुद को बेहद परेशान या तनावग्रस्त महसूस किया, जबकि नौ प्रतिशत छात्रों ने मन में आत्महत्या के विचार आने की बात कही। छात्रों में आत्महत्या के बढ़ते मामलों के विश्लेषण के लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित समिति के राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण में यह जानकारी सामने आई है।

‘पीटीआई-भाषा’ को इस सर्वेक्षण के निष्कर्ष प्राप्त हुए हैं। ऐसी संभावना है कि ये निष्कर्ष उच्च शिक्षण संस्थानों (एचईआई) में छात्रों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को दूर करने और आत्महत्याओं को रोकने के लिए गठित राष्ट्रीय कार्यबल (एनटीएफ) की अंतिम रिपोर्ट का हिस्सा होंगे। यह रिपोर्ट 31 अक्टूबर तक सौंपे जाने की संभावना है।

इस सर्वेक्षण को महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) दिल्ली और आईआईटी मुंबई में दो छात्रों की मौत के बाद छात्र आत्महत्या को लेकर बहस फिर तेज हो गई है और व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिली है।

उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित समिति ने इस साल की शुरुआत में अपनी अंतरिम रिपोर्ट सौंपी थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि छात्रों के लिए उच्च शिक्षा पाना ‘‘गहरी जड़ें जमा चुकी सामाजिक भेदभाव की भावना’’, मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में व्यापक यौन उत्पीड़न के अनुभव से भरा था।

साथ ही, छात्रों ने मेडिकल, कानून और राज्यों के विश्वविद्यालयों में अकादमिक सहायता, छात्रावास में पाबंदियों एवं नैतिक ‘पुलिसिंग’ के मामले में संकाय सदस्यों द्वारा लैंगिक भेदभाव का अनुभव किया।

इसके अलावा, राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा-स्नातक (नीट-यूजी) और राष्ट्रीय संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई) रैंक के आधार पर जाति की पहचान तथा दाखिले, अंक निर्धारण, भाषा की दिक्कत और शिक्षकों के ध्यान देने के स्तर पर भेदभाव तथा जातिगत अपमान जैसी बातें भी सामने आई हैं।

एनटीएफ द्वारा किए गए छात्र सर्वेक्षण में 2.43 लाख से अधिक छात्रों ने हिस्सा लिया, जिनमें से 67 प्रतिशत छात्र अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) श्रेणी से थे। सर्वेक्षण के अनुसार, करीब 34 प्रतिशत छात्रों ने किसी न किसी स्तर पर परिसर में खुद को बाहरी व्यक्ति जैसा महसूस करने की बात कही।

सर्वेक्षण में कहा गया, ‘‘करीब 15 प्रतिशत छात्रों ने पिछले छह महीनों में ऐसे समय को याद किया, जब वे कई हफ्तों तक लगातार बहुत अधिक तनाव, परेशानी में थे या कई हफ्तों तक उदास या बेचैनी महसूस करते रहे। नौ प्रतिशत छात्रों ने बताया कि पिछले एक साल में उन्हें अक्सर या बार-बार आत्महत्या के विचार आए।’’

सर्वेक्षण में पाया गया कि 56 प्रतिशत छात्रों ने गंभीर मुद्दों को निष्पक्ष तरीके से निपटने में संस्थान के प्रशासन की क्षमता पर भरोसा जताया, जबकि करीब 32 प्रतिशत छात्रों ने कहा कि उनके संस्थान में काउंसलिंग की सुविधा नहीं है।

अधिकारियों के अनुसार, शैक्षणिक विकल्पों को लेकर चिंता और रोजगार से जुड़ी लगातार चिंताएं छात्रों के बीच आम थीं।

एक वरिष्ठ अधिकारी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि उभरते रुझान से पता चलता है कि छात्रों की मानसिक सेहत से जुड़ी समस्याओं को हल करने के लिए तुरंत कदम उठाने की जरूरत है।

छात्र सर्वेक्षण के अलावा एनटीएफ ने कई संस्थानों का दौरा किया और संबंधित पक्षों के साथ विचार-विमर्श भी किया।

अधिकारी ने बताया, ‘‘अब तक दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर), तमिलनाडु, कर्नाटक, असम और पश्चिम बंगाल में अलग-अलग तरह के संस्थानों और विषयों से जुड़े 19 संस्थानों में 30 बैठकें की जा चुकी हैं। जिन जगहों का दौरा किया गया उनकी संख्या बहुत कम है, इसलिए यह कोई प्रतिनिधि नमूना नहीं है और इसी वजह से सामने आए विचारों को उसी संदर्भ में देखा जाएगा।

उन्होंने कहा कि सीमाओं और आशंकाओं के बावजूद अधिकतर उच्च शिक्षा संस्थानों के छात्रों ने अपनी शैक्षणिक, सामाजिक, मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षक संबंधी और प्रशासनिक चिंताओं के बारे में विस्तार से बात की।

छात्रों में आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं और उच्च शिक्षा संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य एवं कल्याण संबंधी चिंताओं के विश्लेषण के लिए उच्चतम न्यायालय ने पिछले साल मार्च में इस कार्यबल का गठन किया था।

इस कार्यबल की अध्यक्षता न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट कर रहे हैं। इसमें प्रसिद्ध मनोचिकित्सक आलोक सरीन, सेंटर फॉर वीमेन्स डेवलपमेंट स्टडीज की पूर्व निदेशक मैरी ई. जॉन, नेशनल सेंटर फॉर प्रमोशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट फॉर डिसेबल्ड पीपल के कार्यकारी निदेशक अरमान अली, अमन सत्य कछरू ट्रस्ट के संस्थापक राजेंद्र कछरू और निमहंस की क्लीनिकल मनोविज्ञान की प्रोफेसर सीमा मेहरोत्रा समेत कई विशेषज्ञ शामिल हैं।

अधिकारी ने कहा, ‘‘भले ही 2011-2022 के दौरान उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिले काफी बढ़े हैं (यानी 2.92 करोड़ से बढ़कर 4.33 करोड़ हो गए हैं), लेकिन हम देख सकते हैं कि एनसीआरबी (राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो) के आंकड़ों के मुताबिक, छात्रों की आत्महत्याओं की संख्या कहीं अधिक तेजी से बढ़ी है। इसका मतलब है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिला लेने वाले प्रत्येक एक लाख छात्रों पर आत्महत्या की दर 26.37 से बढ़कर 30.02 हो गई है।’’

भाषा

सुभाष दिलीप

दिलीप


लेखक के बारे में