मां की आय का हवाला देकर पिता नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण के दायित्व से नहीं बच सकता

मां की आय का हवाला देकर पिता नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण के दायित्व से नहीं बच सकता

मां की आय का हवाला देकर पिता नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण के दायित्व से नहीं बच सकता
Modified Date: April 22, 2026 / 10:29 am IST
Published Date: April 22, 2026 12:58 am IST

नैनीताल, 21 अप्रैल (भाषा) उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने कहा है कि एक पिता अपने नाबालिग बच्चे की मां की आय का हवाला देकर या अपनी वित्तीय देनदारियों का जिक्र करके उसके भरण-पोषण के कर्तव्य से बच नहीं सकता ।

न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकलपीठ ने रुड़की परिवार न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें एक पिता को अपने बच्चे को 8,000 रुपये मासिक अंतरिम भरण-पोषण राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था।

बच्चे की मां ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत एक याचिका दायर कर वित्तीय सहायता की मांग की थी। परिवार न्यायालय ने याचिका स्वीकार करते हुए आवेदन की तारीख से पिता को भुगतान का निर्देश दिया था, जिसे उसने उच्च न्यायालय में चुनौती दी ।

पुनर्विचार याचिका में पिता ने कहा कि बच्चे के माता पिता दोनों सरकारी सेवा में हैं । वह स्वयं केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल में कार्यरत हैं, जबकि बच्चो की मां केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल में कार्यरत हैं ओर इसलिए वित्तीय बोझ पूरी तरह से उन पर नहीं पड़ना चाहिए ।

पिता ने ऋण के भुगतान और अपने माता-पिता और भाई-बहनों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों समेत मौजूदा दायित्वों का हवाला भी दिया ।

बच्चे की मां की ओर से दलील दी गयी कि एक स्थिर आय वाला एक स्थायी सरकारी कर्मचारी होने के नाते पिता पर बच्चे के भरण-पोषण का स्पष्ट वैधानिक दायित्व है ।

उच्च न्यायालय ने माना कि मां की आय एक महत्वपूर्ण कारक है, लेकिन साथ ही यह कहा कि केवल इसी बात से पिता अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो जाता । न्यायालय ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 सामाजिक न्याय का एक उपाय है जिसका उद्देश्य निराश्रयता को रोकना है और इसकी व्याख्या इस प्रकार से होनी चाहिए जिससे आश्रितों के हितों की रक्षा हो सके।

न्यायालय ने यह भी कहा कि एक बच्चा अपने माता-पिता के बराबर के जीवन स्तर का हकदार है। अदालत ने माना कि ऋण भुगतान या परिवार के अन्य सदस्यों को दी जाने वाली सहायता जैसी वित्तीय देनदारियां स्वैच्छिक होती हैं और बच्चे के भरण-पोषण के अधिकार पर इन्हें प्राथमिकता नहीं दी जा सकती।

न्यायालय ने 8,000 रुपये प्रति माह की राशि को उचित ठहराते हुए आवेदन दाखिल करने की तिथि से भरण-पोषण का भुगतान करने के निर्देश को बरकरार रखा।

भाषा सं दीप्ति रंजन

रंजन


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