कृषि कानूनों के विरोध की लड़ाई केवल किसानों की नहीं, बल्कि पूरे देश की है: राहुल गांधी

कृषि कानूनों के विरोध की लड़ाई केवल किसानों की नहीं, बल्कि पूरे देश की है: राहुल गांधी

कृषि कानूनों के विरोध की लड़ाई केवल किसानों की नहीं, बल्कि पूरे देश की है: राहुल गांधी
Modified Date: November 29, 2022 / 08:32 pm IST
Published Date: October 6, 2020 12:34 pm IST

सनौर (पटियाला), छह अक्टूबर (भाषा) कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने नए कृषि कानूनों के मुद्दे पर केंद्र सरकार के प्रति अपना हमलावर रुख मंगलवार को भी जारी रखा और कहा कि इन कानूनों के विरुद्ध लड़ाई केवल किसानों और मजदूरों की नहीं है, बल्कि यह “भारत की लड़ाई है।”

मोगा जिले से रविवार को शुरू हुई “खेती बचाओ” यात्रा के समापन पर यहां एक सभा को संबोधित करते हुए गांधी ने कहा कि अगर इन कानूनों को लागू कर दिया गया तो किसान और मजदूर कुछ कारपोरेट घरानों के “गुलाम” बनकर रह जाएंगे।

गांधी ने किसानों से कहा कि एक या दो साल में उनकी जमीनें कुछ “चुनिंदा” कारपोरेट हड़प लेंगे।

उन्होंने कहा, “आप इस पर विश्वास करना चाहें या नहीं, लेकिन यह याद रखे कि राहुल और अमरिंदर सिंह ने कभी आपको बताया था कि आपकी जमीन हड़प ली जाएगी।”

सभा में बहुत सारे किसान अपने ट्रैक्टर लेकर आए थे।

गांधी ने कहा, “यह कार्रवाई करने का समय है। यदि आप छह महीने या साल भर रुक गए तो कोई फायदा नहीं होगा।”

पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि नुकसान केवल किसानों, खेतिहर मजदूरों और छोटे व्यापारियों का ही नहीं बल्कि देश का है।

गांधी ने कहा कि नए कानून लागू होने से अगर किसान प्रभावित हुए तो भारत की खाद्य सुरक्षा समाप्त हो जाएगी।

उन्होंने कहा, “अगर यह होता है तो पूरा देश पुनः गुलाम बन जाएगा।” उन्होंने कहा, “यह लड़ाई केवल किसानों और मजदूरों की नहीं बल्कि पूरे भारत की है।”

उन्होंने किसानों से कहा कि कारपोरेट कंपनियां नियम बनाएंगी और जिस मूल्य पर खरीदना चाहेंगी वह किसानों को मानना होगा।

केंद्र सरकार की आलोचना करते हुए गांधी ने कहा कि छह साल में सरकार ने गरीबों, कमजोर वर्ग के लोगों, किसानों और छोटे दुकानदारों के लिए कुछ नहीं किया।

उन्होंने कहा, “छह साल तक, उन्होंने किसानों के लिए कुछ नहीं किया। उन्होंने जो कुछ भी किया वह अमीर वर्ग के लिए किया।”

गांधी ने कहा कि केंद्र सरकार ने अमीर उद्योगपतियों के साढ़े तीन लाख करोड़ के ऋण माफ कर दिए लेकिन किसानों को कुछ नहीं दिया।

भाषा यश पवनेश

पवनेश


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