पूर्व टीडीबी प्रमुख के दावों के बाद शबरिमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा फिर से उठा

पूर्व टीडीबी प्रमुख के दावों के बाद शबरिमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा फिर से उठा

पूर्व टीडीबी प्रमुख के दावों के बाद शबरिमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा फिर से उठा
Modified Date: June 14, 2026 / 04:50 pm IST
Published Date: June 14, 2026 4:50 pm IST

तिरुवनंतपुरम, 14 मई (भाषा) केरल में शबरिमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दे ने रविवार को एक बार फिर तूल पकड़ लिया, जब 2019 में पहाड़ी मंदिर में रजस्वला उम्र की महिलाओं के कदम रखने से जुड़ी घटना के संबंध में टीडीबी के पूर्व अध्यक्ष ए पद्मकुमार के कथित दावों वाली खबरें सामने आईं।

हालांकि, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) पद्मकुमार के दावों पर प्रतिक्रिया देने से हिचकिचाती दिखी। पूर्व मुख्यमंत्री एवं विपक्ष के नेता पिनराई विजयन और माकपा के प्रदेश सचिव एमवी गोविंदन ने पद्मकुमार के आरोपों को खारिज कर दिया।

खबरों में दावा किया गया है कि त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (टीडीबी) के तत्कालीन अध्यक्ष पद्मकुमार ने अपने करीबी सहयोगियों से कहा था कि उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद जिस दिन दो महिलाओं ने शबरिमला मंदिर में प्रवेश किया था, उस दिन उन्हें और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी एस. श्रीजीत को जानबूझकर सन्निधानम से दूर रखा गया था।

खबरों में कहा गया है कि पद्मकुमार ने आरोप लगाया था कि यह कदम एक “बेहद प्रभावशाली व्यक्ति” के इशारे पर उठाया गया था, जिसकी माकपा और तत्कालीन वामपंथी सरकार, दोनों पर काफी अच्छी पकड़ थी।

खबरों के मुताबिक, पद्मकुमार ने दावा किया था कि उनसे उस दिन शबरिमला की यात्रा न करने और इसके बजाय तिरुवनंतपुरम जाने के लिए कहा गया था।

माकपा के पूर्व विधायक पद्मकुमार ने शबरिमला मंदिर में सोने की चोरी से जुड़े मामले में आरोपी के रूप में नामजद किए जाने के बाद पार्टी से दूरी बना ली है। उन्होंने मामले में जमानत पर रिहा होने के बाद से मीडिया से अभी तक कोई बातचीत नहीं की है।

ये खबरें ऐसे समय में आई हैं, जब माकपा नेतृत्व ने संकेत दिया है कि शबरिमला में सोने की चोरी से जुड़े मामले में पद्मकुमार के खिलाफ संगठनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।

विजयन ने तिरुवनंतपुरम में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में पद्मकुमार के कथित दावों को खारिज करते हुए कहा कि ऐसी कोई घटना नहीं घटी थी।

उन्होंने कहा, “मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है, क्योंकि ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया था। असल बात तो यह है कि मुख्यमंत्री कार्यालय को पद्मकुमार को शबरिमला से दूर रखने की कोई जरूरत नहीं थी।”

जब पद्मकुमार के इन कथित घटनाओं के बारे में आत्मकथा लिखने की खबरों के बारे में पूछा गया, तो विजयन ने कहा कि लोगों का आत्मकथा लिखना कोई असामान्य बात नहीं है।

उन्होंने कहा, “आजकल आत्मकथा लिखना कोई नयी बात नहीं है। कई लोग आत्मकथाएं लिखते हैं, लेकिन इससे पार्टी के रुख में कोई बदलाव नहीं आएगा।”

पद्मकुमार के कथित दावों से जुड़ी खबरों पर माकपा की प्रतिक्रिया के बारे में पूछे जाने पर गोविंदन ने कहा कि टीडीबी के पूर्व अध्यक्ष को खुद इस मामले पर स्पष्टीकरण देना चाहिए।

उन्होंने कहा, “इन सभी आरोपों का जवाब देना हमारी जिम्मेदारी नहीं है। ये सवाल पद्मकुमार से पूछे जाने चाहिए। शबरिमला में सोना चोरी के मामले में जेल से छूटने के बाद उन्हें पार्टी की सभी जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया गया था।”

गोविंदन ने कहा कि पद्मकुमार के खिलाफ किसी भी संगठनात्मक कार्रवाई का फैसला माकपा की पत्तनमथिट्ठा जिला समिति करेगी।

उन्होंने कहा, “संगठनात्मक कार्रवाई करने के लिए जिला समिति ही सक्षम प्राधिकारी है। वह निश्चित रूप से उचित फैसले लेगी।”

केरल में शबरिमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा सबसे विवादास्पद राजनीतिक और सामाजिक विवादों में से एक बना हुआ है।

सितंबर 2018 में शीर्ष अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसले में सदियों पुरानी उस प्रथा को रद्द कर दिया, जिसके तहत 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं के शबरिमला मंदिर में कदम रखने पर रोक थी। न्यायालय ने कहा था कि यह रोक समानता और पूजा की आजादी के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करती है।

इस फैसले के बाद पूरे केरल में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन हुए। अयप्पा भक्तों के एक वर्ग और संघ परिवार से जुड़े संगठनों ने फैसले को लागू किए जाने का विरोध किया। उन्होंने माकपा के नेतृत्व वाली तत्कालीन वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) सरकार पर मंदिर की परंपराओं में “दखल देने की कोशिश” करने का आरोप लगाया।

जनवरी 2019 में यह विवाद तब और बढ़ गया, जब रजस्वला उम्र की दो महिलाओं ने पुलिस सुरक्षा में शबरिमला मंदिर में प्रवेश किया। वे उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद ऐसा करने वाली वे पहली महिलाएं थीं।

इस घटनाक्रम के कारण बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन, राजनीतिक टकराव और कानूनी चुनौतियां सामने आईं। तत्कालीन एलडीएफ सरकार ने अपने कदमों का बचाव करते हुए कहा कि वह शीर्ष अदालत के आदेश को लागू करने के लिए बाध्य थी।

सर्वोच्च न्यायालय ने बाद में धार्मिक रीति-रिवाजों और लैंगिक न्याय से जुड़े व्यापक सवालों को उठाने वाली याचिकाओं को एक बड़ी पीठ के पास भेज दिया। यह मामला अब भी अदालत में लंबित है।

भाषा पारुल सुरेश

सुरेश


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