1868 का ‘शाही ताजिया’ आज भी बना है जयपुर की गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल

1868 का ‘शाही ताजिया’ आज भी बना है जयपुर की गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल

1868 का ‘शाही ताजिया’ आज भी बना है जयपुर की गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल
Modified Date: June 26, 2026 / 08:28 pm IST
Published Date: June 26, 2026 8:28 pm IST

जयपुर, 26 जून (भाषा) जयपुर में 1868 में महाराजा सवाई राम सिंह द्वारा बनवाया गया ऐतिहासिक स्वर्ण-रजत ‘शाही ताजिया’ इस वर्ष भी ‘आशूरा’ के मौके पर निकाला गया। यह ताजिया शहर की साझा सांस्कृतिक विरासत और सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक माना जाता है।

सिटी पैलेस के बाहर त्रिपोलिया गेट के निकट प्रदर्शित बारीक नक्काशी वाले इस शाही ताजिए को देखने के लिए हर वर्ष हजारों लोग पहुंचते हैं।

इस्लामी कलेंडर के पहले महीने मुहर्रम के 10वें दिन ‘आशूरा’ को कहा जाता है। इस दिन देश के अलग अलग हिस्सों में इमाम हुसैन की याद में ताजिया जुलूस निकाला जाता है। 680वीं ई. में पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन और उनके करीबी साथियों को इराक के करबला में इसी तारीख को शहीद कर दिया गया था।

जयपुर में शुक्रवार को ‘आशूरा’ के दौरान निकलने वाले 300 से अधिक ताजियों के बीच यह ताजिया अपनी विशिष्ट पहचान रखता है।

इस धरोहर का पीढ़ियों से संरक्षण कर रहे कारीगर अब्दुल सत्तार ने बताया कि यह ताजिया जयपुर की गंगा-जमुनी तहजीब और विभिन्न समुदायों के बीच आपसी सम्मान एवं सौहार्द का प्रतीक है।

उन्होंने कहा, “यह ताजिया हिंदू शासक ने बनवाया था और अपनी तरह का एकमात्र ताजिया है। यह एकता और साझा विरासत का प्रतीक है।”

सत्तार ने बताया कि उस समय इस ताजिए के निर्माण में करीब 10 किलोग्राम सोना और 60 किलोग्राम चांदी का उपयोग किया गया था और आज भी इसकी चमक, बारीक धातु-कला और उत्कृष्ट नक्काशी बरकरार है।

उन्होंने बताया कि इसे केवल ‘आशूरा’ के दौरान आम लोगों को दिखाने के लिए बाहर निकाला जाता है और वर्ष के बाकी समय बेहद सावधानी से सुरक्षित रखा जाता है। अन्य ताजियों की तरह इसे करबला में दफन नहीं किया जाता।

सत्तार के अनुसार, यह ताजिया पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन के रौज़े (मजार) का प्रतीक है।

उन्होंने कहा, ‘यहां हिंदू समुदाय के सदस्य भी आकर श्रद्धा व्यक्त करते हैं और मनौती के धागे बांधते हैं, जो शहर में गहरे सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है।’

अधिकारियों के अनुसार, इस शाही ताजिए के संरक्षण की परंपरा करीब 150 वर्षों से लगातार चली आ रही है। यह धरोहर पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित की जा रही है और जयपुर की सांप्रदायिक एकता तथा साझा सांस्कृतिक विरासत की अमिट पहचान को मजबूत करती है।

भाषा बाकोलिया जितेंद्र नोमान

नोमान


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