ताडोबा में बाघों की वापसी की कहानी, जंगल में वन्य जीवन का रोमांच

ताडोबा में बाघों की वापसी की कहानी, जंगल में वन्य जीवन का रोमांच

ताडोबा में बाघों की वापसी की कहानी, जंगल में वन्य जीवन का रोमांच
Modified Date: March 8, 2026 / 05:18 pm IST
Published Date: March 8, 2026 5:18 pm IST

(विजय जोशी)

(तस्वीरों सहित)

ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान (महाराष्ट्र), आठ मार्च (भाषा) एक समय था जब भारत में बाघों के विलुप्त होने की आशंका जताई जाने लगी थी। एक दशक पहले तक ताडोबा-अंधारी बाघ अभयारण्य की स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी, जब यहां बाघों की संख्या सिमटकर महज 30 रह गई थी लेकिन संरक्षण के लगातार और सुनियोजित प्रयासों ने तस्वीर पूरी तरह बदल दी-आज इस अभयारण्य व आसपास के क्षेत्र में बाघों की संख्या बढ़कर करीब 200 हो गई है।

ज्यादातर पर्यटक जहां ताडोबा में बाघों की एक झलक पाने की उम्मीद से आते हैं, वहीं यह अभयारण्य कई अन्य वन्य जीवों का भी घर है, जो सफारी पर आने वालों को उतना ही रोमांचित करते हैं। आइए नजर डालते हैं ताडोबा के कुछ प्रमुख और आकर्षक वन्य जीवों पर:

हिरण: हिरणों के परिवार में सांभर, चीतल और काकड़ शामिल हैं। नर हिरणों के सींग प्रजनन के मौसम में अपने पूरे आकार में आ जाते हैं और हर साल झड़ जाते हैं। ये सींग शाखाओं वाले हो सकते हैं और पूरी तरह हड्डी के बने होते हैं, लेकिन इनमें केराटिन नहीं होता। केराटिन वही पदार्थ है जो हमारे बालों और नाखूनों में पाया जाता है।

जंगल में खतरे की आहट मिलते ही सांभर का व्यवहार देखने लायक होता है। यह घबराकर तुरंत भागता नहीं, बल्कि पहले आसपास की झाड़ियों में आड़ लेता है या खुले मैदान में जाकर ठिठककर चारों ओर नजर दौड़ाता है—मानो अदृश्य खतरे को भांपने की कोशिश कर रहा हो।

सतर्क होते ही उसकी पूंछ तनकर ऊपर उठ जाती है। अगर उसे यकीन हो जाए कि खतरा सचमुच पास है, तो वह अपने अगले पैरों को जमीन पर जोर से पटकता है और चेतावनी भरी तेज ‘आवाज’ निकालता है। जंगल के जानकारों के लिए यह आवाज लगभग पक्की खबर होती है कि कहीं आसपास बाघ घूम रहा है—ठीक वैसे ही जैसे चीतल की रंभाने जैसी आवाज भी बाघ की मौजूदगी का संकेत देती है।

काकड़ जंगल का एक बेहद दिलचस्प और रहस्यमय जीव है। इसकी आवाज कुत्ते के भौंकने जैसी होती है और जब जंगल की खामोशी में इसकी भौंकने जैसी आवाज गूंजती है, तो आसपास के जानवर तुरंत सतर्क हो जाते हैं। दुनिया के सबसे प्राचीन हिरणों में गिने जाने वाले इस जीव की चाल भी निराली है। चलते समय यह ऐसे उछलता-कूदता है, मानो उसके पैरों में स्प्रिंग लगी हो।

इस छोटे से हिरण की एक खासियत यह भी है कि स्तनधारियों में इसके क्रोमोसोम की संख्या सबसे कम मानी जाती है।

मृग: ताडोबा बाघ अभयारण्य के जंगलों में मृगों की दुनिया भी कम दिलचस्प नहीं है, जहां मुख्य रूप से नीलगाय और चौसिंगा जैसी प्रजातियां पाई जाती हैं। इन मृगों की सबसे खास पहचान उनके स्थायी सींग होते हैं जो हिरणों की तरह हर साल गिरते नहीं और न ही इनमें शाखाएं निकलती हैं। इसके बजाय इनके सींग कई बार अनोखा और विचित्र आकार ले लेते हैं, जो इन्हें जंगल में अलग पहचान देते हैं। ये सींग अंदर से हड्डी के बने होते हैं और ऊपर से केराटिन की परत से ढके रहते हैं।

भारतीय गौर: पहली नजर में अक्सर इसे भैंस समझ लिया जाता है, लेकिन सच यह है कि भारतीय गौर का उससे कोई सीधा संबंध नहीं है। यह करीब 1,000 किलोग्राम तक वजनी नर गौर बोवाइन परिवार का सबसे विशाल सदस्य माना जाता है। मादा और शावक, नर जितने गहरे रंग के नहीं होते, लेकिन एक पहचान सबमें समान होती है—पैरों पर सफेद मोजों जैसे निशान, जो दूर से ही उनकी पहचान बता देते हैं।

गौरों का समाज भी बड़ा रोचक होता है। उनका झुंड एक अनुभवी मादा के नेतृत्व में चलता है—वही दिशा तय करती है और वही खतरे को भांपती है। नर गौर आमतौर पर दूर ही रहते हैं और केवल प्रजनन के मौसम में इस झुंड से जुड़ते हैं।

स्लॉथ भालू: जंगल की खामोशी में पेड़ों के तनों पर पड़े गहरे नाखूनों के निशान अक्सर एक खास मेहमान ‘स्लॉथ भालू’ की कहानी कहते हैं। यह भालू अपने पसंदीदा शहद की तलाश में फुर्ती से पेड़ों पर चढ़ जाता है और पीछे छोड़ जाता है अपने पंजों के तीखे निशान।

जहां ज्यादातर जानवरों के चारों पंजों के निशान लगभग एक जैसे दिखते हैं, वहीं इस भालू के पिछले पैर लंबे और चपटे होते हैं, जिनके निशान कीचड़ में लगभग इंसानी पैरों जैसे दिखाई देते हैं। वहीं इसके अगले पैरों के निशान मांसाहारी जानवरों के पंजों से मिलते-जुलते लगते हैं। इसकी वजह भी खास है—इंसानों की तरह भालू भी अपने पिछले पैरों पर खड़ा हो सकता है।

एशियाई जंगली कुत्ता: लाल रंग, घनी झबरीली पूंछ और झुंड में गूंजती सीटी जैसी आवाज-यही पहचान है ढोल यानी एशियाई जंगली कुत्तों की। जंगल में ये आपस में भौंककर नहीं, बल्कि सीटी जैसी आवाजों से संवाद करते हैं। नर ढोल कभी-कभी अपने पिछले एक या दोनों पैरों को उठाकर हाथ के बल खड़े होने जैसी मुद्रा बनाते हैं और इसी अंदाज में पेशाब कर अपने इलाके की सीमा तय करते हैं।

आकार में छोटे होने के बावजूद इनका साहस कम नहीं होता। ये आमतौर पर झुंड बनाकर शिकार करते हैं और कई बार इतनी हिम्मत दिखाते हैं कि बंगाल टाइगर या तेंदुए के मारे गए शिकार पर भी धावा बोलकर उसे छीन लेते हैं।

तेंदुआ: सुनहरे शरीर पर काले धब्बों की खूबसूरत बनावट वाला तेंदुआ भारत के विशाल भूभाग में पाया जाता है—उत्तर के हिमालय से लेकर दक्षिण के पश्चिमी घाट तक। ताडोबा बाघ अभयारण्य में तेंदुओं की संख्या ताजा गणना के अनुसार 127 बताई जाती है। लेकिन अपने शर्मीले स्वभाव और पेड़ों पर रहने की आदत के कारण इनकी झलक मिलना आसान नहीं होता।

तेंदुआ और पैंथर दरअसल एक ही प्रजाति के नाम हैं।

ताडोबा की दुनिया सिर्फ इन बड़े जानवरों तक सीमित नहीं है। यहां पक्षियों की दर्जनों प्रजातियां, रंग-बिरंगी तितलियां, मकड़ियां और कई तरह के सरीसृप भी इस जंगल की जैव विविधता को और समृद्ध बनाते हैं।

ताडोबा के स्तंभ: घने जंगल में बीच-बीच में खड़ीं चौखूंटा मीनारें यहां आने वालों का ध्यान तुरंत खींच लेती हैं। अभयारण्य में जगह-जगह दिखाई देने वाली ये मीनारें आकार में कुछ-कुछ मिस्र के चौखूंटा स्तंभों जैसे लगती हैं। माना जाता है कि ये स्तंभ ब्रिटिश शासनकाल में उस समय बनाए गए थे, जब जंगल बेहद घना था। संभवत: रास्ता भटकने से बचाने के लिए इन्हें दिशासूचक संकेत के रूप में खड़ा किया गया था।

हर स्तंभ के शीर्ष पर एक निशान बना होता है, जो अगले स्तंभ की दिशा बताता है। इस तरह एक स्तंभ से दूसरे स्तंभ तक बढ़ते हुए लोग जंगल से बाहर निकलने का रास्ता तलाश लेते थे।

कैसे पहुंचे: ताडोबा बाघ अभयारण्य की रोमांचक दुनिया तक पहुंचने का सबसे आसान रास्ता नागपुर से होकर है। नागपुर तक विमान या ट्रेन से आसानी से पहुंचा जा सकता है। यहां से चंद्रपुर के रास्ते करीब साढ़े तीन घंटे की सड़क यात्रा आपको सीधे मोहरली गेट तक ले जाती है—और यहीं से शुरू होता है जंगल का असली रोमांच।

स्रोत: ताडोबा-अंधारी बाघ अभयारण्य कंजर्वेशन फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित और महाराष्ट्र सरकार के प्रधान मुख्य वन संरक्षक महदीप गुप्ता द्वारा प्रस्तुत पुस्तक ‘एनचैंटिंग ताडोबा’।

भाषा खारी नरेश

नरेश


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